इशारों- इशारों में

एक गृहणी घर के काम हों या हो घर वालों की फरमाईश सारा दिन घर में यहां से वहां और वहां से यहां नाचती रहती है। पति बॉस को खुश करने के लिये उसके आगे पीछे नाच रहा है। कुछ बेचारे पति पत्नी के इशारों पर भी नाचने में माहिर होते हैं।इशारों पर नाचनें की बात का क्या कहें हम अब लोग तो उंगलियों पर भी नाच लेते हैं।   ऐसा हम नहीं कहते जमाना कहता है।चालू भाषा में लोग अपनी बात को इसी तरह से व्यक्त करते हैं। इस सृष्टि में जितनी भी जीव आत्माएं हैं सभी नाच रही हैं।इसमें पशु-पक्षी भी शामिल हैं। फिर चाहे वह शहर में रहने वाले लोग हों या जंगल में रहने वाले आदिवासी। शहरों के लोग पढ़े लिखें हैं इसलिये वह क्लबों में नाचते हैं और आदिवासी जंगल में मंगल मना नाच रहे होते हैं। 

जिन्हें कहीं मौका नहीं मिलता वह अपने नाचने के फन का लोहा बारात में नाचकर मनवालेते हैं। फिल्मों में हीरो हिरोइन नाच रहे होते हैं। शोले फिल्म की बसंती हो या मुगले आजम की अनारकली हो बिना नाचे तो फिल्मों में भी बात नहीं बनती है। चाहे राधा नाचे या मीरा नाचे श्याम को कहां फर्क पड़ता है।नाचना तो श्याम को भी है। और जब श्याम नाच रहें हैं तो हरे कोई मंत्र मुग्ध हो उनका नाच देखने को उतावला हो ही जाता है फिर चाहे वह कालिया नाग के फन पर नृत्य करते हुये श्याम हों।नृत्य तो सभी का मन मोह ही लेता है। और यही कारण है कि मन मयूर नाच उठता है। और जब मन मयूर नाचता है तो असली मयूर या मोर कैसे पिछे रह सकता है।

 शहरों में तो पब्लिक यहां से वहां वहां से यहां नाच रही होती है। बेचारे मोर को नाचने के लिए जंगल का रुख करना ही पड़ता है वहीं कुछ मोर चिड़ियाघर में भी नाच कर काम चला लेते हैं। आदि काल से हमारे देवी देवता भी नृत्य करते आये हैं।नृत्य हमारी अति प्राचीन परंपरा है।हमारे यहां एक तीसरा वर्ग भी है। जो किन्नर वर्ग है। यह वर्ग भी दूसरों के लिये ही नाच रहा है।आपकी और हमारी खुशियों के लिये।इस संसार में हर कोई नाच रहा है। यक्ष,किन्नर,देवी देवता और भूत पिशाच तक नृत्य करते आये हैं।

भगवान इंद्र के दरबार में मेनका,तिलोत्तमा उर्वशी और रंभा जैसी अनुपम सौंदर्याओं का मन भावन नृत्य जहां इंद्रलोक की अनुपम छवि प्रस्तुत करता है वहीं वह साधारण मानव तथा पशु पक्षी में भी नृत्य के प्रति लगाव भी दर्शाता है। कभी-कभी नृत्य से बड़े-बड़े नुकसान भी हो जाते हैं।जैसे विश्वामित्र की तपस्या एक अदद मेनका नें अपने सौंदर्य और नृत्य के माध्यम से भंग कर दी थी।जहां महादेव तांडव नृत्य करते हैं वहीं भगवान विष्णु अपना मोहिनी रूप में नृत्य करते हैं।भगवान से प्रेरणा लेकर पशु पक्षी भी नृत्य करने में जुटे हुए हैं। मदारी के इशारों पर बंदर और भालू का नाच तो बचपन में बहुत देखा है। 

वहीं सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर शेर हाथी और अन्य जानवरों को भी नाचते देखा है। इसे आप कलाबाजी कहते होंगे पर बेचारे बेजुबान जानवर तो वैसे ही नाच रहे होंगे जैसे कि पति पत्नी की उंगलियों पर अथवा इशारों पर नाचता है। एक बार फिर से "यह हम नहीं कहते जमाना कहता है"।इतने सारे नृत्य के उदाहरण देखने के बाद सांप को कैसे छोड़ दें।आस्तीन के सांप तो नाचते नहीं बल्की नचाते हैं। और असली सांप को या तो नागिन नचा रही होती है या सपेरा अपनी बीन पर नचा रहा होता है।

अभी तक जितने उदाहरण हमने देखें सभी अपने पांव पर ही नाचें हैं बस सांप ही बिना पांव के नाचता है। और यही सांप आस्तीन में घुस जाये तो अच्छे-अच्छों को नचा देता है।चलते - चलते मोर की तारीफ में भी दो शब्द हो जायें कि मोर बेचारा बिना वंसमोर बोले भी अपने समय पर नाच लेता है।नाच ना जाने आंगन तेड़ा,नाच को आंच नहीं या नाच की कोई जांच नहीं टीवी प्रोग्राम हों या हो सिर्फ नेता अधिकारी के लिये नाच। हम क्या कहें आप खुद ही समझदार हैं क्यों कि हमारे साथ आप भी तो कभी मजबूरीवश तो कभी जिम्मेदारियों के चलते नाच रहे हैं।और खुशी में नाच रहे हों तो ऐसे ही नाचते रहें बड़ा अच्छा लगता है।


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार

 ramamedia15@gmail.com