आओ रे माधव

धरा फिर कुरुछेत्र बनी है 

पांडव पर विपदा आन पड़ी है 

कौरव ने विध्वंस मचाया 

आओ माधव तेरी पुकार मची है 

कोई पथ सुझता नहीं है 

शत्रु की हिम्मत बढ़ी है 

मानवता के दुश्मन ऊपर 

हर ओर त्राही त्राही मची है 

किस से कोई आस लगाए 

नयनों को काल दिखाए 

पल पल साँसे टूट रही 

कैसे कोई हिम्मत बँधाए 

तोड़ दो अब क़सम अपनी 

राह देख थके सब  तिहारी

उपदेशों से काम ना बनेगा 

चक्र उठाओ अब बनवारी 

नहीं समझते प्रेम की भाषा 

चित्त जब अवगुण में लागा 

प्राणों का स्पंदन   प्रेम ही 

स्वार्थ में मिटी प्रीत अभिलाषा 


सवि शर्मा 

देहरादून