कैसी दोस्ती

बहुत उदास थी नेहा आज ।

बात ही कुछ ऐसी थी और इस एक बात ने उसको अंदर तक तोड़ डाला था। पहली बार उसके साथ किसी दोस्त ने इस तरह का व्यवहार किया था। कितना विश्वास हो गया था उसको अपनी और मीना की दोस्ती पर। 


कभी कभी वो दिन याद आ जाते जब वो इस सोसाइटी में शिफ्ट हो कर आई थी।कितना अकेला पन लगता था।  इतने भरे पूरे परिवार से निकल के एक दम अकेले रहना और फिर रौनक वाले गली मोहल्ले से एक दम ऐसी सोसाइटी में आ जाना जहां किसी को किसी के दुख सुख से कोई सरोकार नही।


 लगता नही था कि वो ज्यादा दिन यहां रह पाएगी और अगर रह गयी तो ये अकेलापन उसको पक्का ही पागल कर देगा।क्योंकि जब तक बेटी थी तब तक तो इतना महसूस नही हुआ लेकिन जब बेटी की शादी हो गयी तो लगता था कि ये  घर उसको खाने को दौड़ता है ।


सुबह का समय तो  घर के कामों मे निकल जाता लेकिन जैसे जैसे शाम होती तो उदासी और अकेलापन और ज्यादा बढ़ जाता।

ऊपर से डिप्रेशन की खानदानी बीमारी ।सोच के ही डर लगता कि कहीं वो भी डिप्रेशन का शिकार हो गयी तो?????


ऐसे में उसने खुद को व्यस्त करने के लिए शाम को सोसाइटी के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। बच्चों के साथ उसका बहुत दिल लगता और बहुत बढ़िया समय बीत जाता।ऐसे में अपनी बेटी को ट्यूशन पढ़ाने के लिए ले के आयी मीना जैसे उसके लिए रोशनी की किरण बन कर आई। 


धीरे धीरे दोनों में खूब अच्छी दोस्ती हो गयी। दोनों फ्री हो कर  रोज मिलती और अगर नही  मिल पाती तो फोन पर खूब बातें करती।


 कई बार नेहा को महसूस भी हुआ कि मीना कुछ गर्म दिमाग की है । दूसरों की हल्की  फुल्कीबातों को भी कुछ ज्यादा ही नेगेटिव तरीके से लेती है।लेकिन जहां दोस्ती और प्यार होता है वहां ये सब बातें इग्नोर ही करनी पड़ती हैं और करनी भी चाहिए तभी रिश्ते आगे बढ़ते हैं।


लेकिन आज तो नेहा बहुत ज्यादा परेशान हो गयी थी जब मीना ने एक काम वाली बाई की कही हुई बात को ही सच मानकर अपनी ही सखी  पर शक किया और फोन करके खूब सारी बातें सुन दी। 


 नेहा फोन बंद करने के बाद भी बहुत देर तक उदास और गुमसुम बैठी रही और बहुत देर तक यही सोचती रही कि उसको दोस्ती करने और दोस्त को पहचानने में इतनी बड़ी भूल कैसे हो गयी।


मौलिक रचना

रीटा मक्कड़