धर्मनिरपेक्षता

राजनीतिक महत्वकांक्षा की संतान 'धर्मनिरपेक्षता' ,

जिसने चालाकी से संविधान के पन्नों में शरण ली ,

आज तक नाचती जा रही कठपुतली बन ,

राजनीतिक आकाओं के मतलबी इशारों पर ।

दीमक की मानिंद धीरे-धीर चाटती रही सांस्कृतिक नींव ,

करती रही खोखला , देश की सांस्कृतिक विरासत को ।

नापाक राजनीति की शह पर चलती रही साज़िशें ,

धर्म ,जाति , भाषा , नस्ल , लैंगिकता के आधार पर बांटने की ।

कुंठित , लाचार सी पड़ी रही सामाजिक समरसता ,

भाव-शून्य सिसकती रही दूर खड़ी , विविधता में एकता ।

तुष्टिकरण का जिन्न भी बहला-फुसला , जकड़ता रहा ,

टुकड़ों में बंटे सामाजिक सद्भाव को अपने मोहपाश में ।

बेख़ौफ़ फलता-फूलता रहा धार्मिक उन्माद मग़र ,

पंगु शासन-प्रशासन , न्यायिक व्यवस्था मूकदर्शक बनी रही ।

प्रदत्त अधिकारों के बंधन में जकड़ा देश का संविधान ,

असहाय सा ख़ुद अपने अधिकार को बचाने में असमर्थ ।

ढहता रहा सामाजिक ताना-बाना 'धर्मनिरपेक्षता' के बोझ तले ,

कभी दंगों की आड़ में तो कभी लव-ज़िहाद के खेल से ।


सुभाष चंद्र झा 'अकेला '

जमशेदपुर , झारखंड

9234620724