31 जुलाई: मुंशी प्रेमचंद जयंती पर विशेष

बहुत ही विषम परिस्थितियों का सामना कर अपने जीवन के सफर को तय करने वाले प्रेमचंद मुंशी प्रेमचंद जी,जिनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था ,हिंदी के एक लोकप्रिय एवम महान साहित्यकार,कहानी कार,विचारक एवं उपन्यासकार थे। इनका पूरा बचपन भयंकर गरीबी में गुजरा ।खाने के लिए अपर्याप्त भोजन और पहनने के लिए इनके पास अपर्याप्त कपड़े ही होते थे ।इनकी माता का अल्पायु में स्वर्गवास होने के बाद इनकी सौतेली मां का व्यवहार इनके लिए कभी अच्छा नहीं रहा ।अपनी कम उम्र में शादी होने की वजह से इन्होंने खुद को काफी मुश्किल हालात में पाया। अपने वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट होने के साथ-साथ उन्हें उम्र भर अपने पिताजी की पसंद अर्थात् अपनी जीवन संगिनी को लेकर सदैव मन में एक टीस एवम पछतावा रहा क्योंकि उनकी बीवी उनकी पसंद के अनुरूप सुशील एवं सुंदर नहीं थी।

जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रेमचंद जी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। वह बचपन से ही वकील बनना चाहते थे, परंतु गरीबी ने उनके इस सपने को बचपन में ही तोड़ दिया। घर में खाने की रोटी मुश्किल से जुटा पाते थे ,ऊपर से पिता के देहांत के बाद घर के पांच पांच लोगों का लालन-पालन ,भरण पोषण सबकी जिम्मेदारी इन्हीं पर आ गई थी ।गरीबी के चलते इन्होंने अपनी सभी किताबें तक बेच दी।

परंतु कहते हैं ना कि - होनहार बिरवान के होत चिकने पात ,अर्थात बचपन से ही साहित्य के प्रति उनके झुकाव एवम रूचि को उनकी गरीबी एवं प्रतिकूल परिस्थितियां भी रोक न सकी ।प्रेमचंद जब मिडिल थे ,तभी से उन्होंने उपन्यास पढ़ने आरंभ कर दिए थे ।उर्दू के वह माहिर थे एवं उर्दू उपन्यासों का नशा उन पर ऐसा चढ़ा कि नोवल खरीदने के पैसे ना होने के कारण बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही नोवल पढ़ने लगे और कुछ ही समय में उन्होंने सैकड़ों की संख्या में नोवल पढ़ डाली।

नोबेल पढ़ने के शौक को पूरा करने के लिए इन्होंने बुकसेलर से जबरदस्ती दोस्ती जारी रखी, ताकि उन्हें मुफ्त में नोवल पढ़ने का मौका मिलता रहे। मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमों को इन्होंने बहुत ही कम समय में पूरा पढ़ लिया था एवं बड़ी-बड़ी किताबों और उपन्यासों को पढ़ने के बाद प्रेमचंद ने अपनी गरीबी एवं घर के खस्ता हालातों को अपनी मंजिल से सदा दूर रखना चाहा।

आई विषम परिस्थितियां, था विपदाओं ने घेरा

साहित्य जगत में लगा रहा पर

मुंशी जी का डेरा

साहित्य के प्रति अपने रुझान को धीरे-धीरे प्रेमचंद ने लिखकर व्यक्त करना शुरू किया। 13 वर्ष की छोटी आयु में ही इन्होंने कुछ नाटक और उपन्यास लिखे।इन का साहित्यिक सफर इसी उम्र से शुरू हुआ जो उनकी अंतिम सांस तक यूं ही चलता रहा और निखरता रहा।

पत्नी से लगातार अनबन रहने के कारण इनकी पत्नी इन को छोड़कर मायके चली गई ।इसके बाद इन्होंने शिवरानी देवी से दूसरी शादी कर ली जो कि एक बाल विधवा थी एवम विधवाओं के प्रति इनका सदैव स्नेह एवं सहानुभूति पूर्ण व्यवहार रहता था।विवाह के पश्चात उनके लेखन में एक अलग ही निखार एवं सजगता आई। वह दिन दुगनी रात चौगुनी उन्नति करने लगे एवम इनका साहित्य लोक प्रचलित हुआ। इनकी पांच कहानियों का संग्रह : सोजे वतन ,उस जमाने में काफी मशहूर हुआ ।

प्रेमचंद जी सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखते थे ।जीवन की विषम परिस्थितियों से हार मानना उन्होंने कभी नहीं सीखा ,अपितु जीवन की परेशानियों को लेकर आगे बढ़ना एवं उन पर विजय प्राप्त करने का जो उदाहरण मुंशी प्रेमचंद ने प्रस्तुत किया वह अति सराहनीय एवं अनुकरणीय है।

प्रेमचंद काफी हंसमुख प्रकृति के व्यक्ति थे ।उनकी सरलता, सौजन्यता और उदारता जग जाहिर थी। अपने मित्रों के प्रति उनके मन में सदैव उदार भाव रहता था ।गरीबों और मजदूरों के प्रति उनके दिल में विशेष स्थान था। उन्हें बाहरी आडंबर एवं दिखावों से सख्त परहेज़ था।

उनके अधिकतर उपन्यासों में ग्रामीण संस्कृति एवं परिवेश के प्रति उनका प्रेम साफ झलकता है। प्रेमचंद जी को कलम के सिपाही भी कहा जाता है। उनका मानना था कि जिस इंसान को पेट भर रोटी नहीं मिलती उसके लिए नियम ,कानून मर्यादा ,इज्जत सब एक प्रकार से ढोंग होते हैं ।दुनिया में रह मुश्किलों का सामना कर अनुभव प्राप्त करना और अनुभवों को साथ लेकर जीवन यात्रा को पूरी करना ही जीवन की सबसे बड़ी सौगात है ।उनके उपन्यासों के प्रमुख विषय : गरीबी, सामाजिक परिवर्तन ,ग्रामीण संस्कृति, विनम्रता, सदव्यवहार ,गुरुर ,चिंता, अन्याय ,लगन ,नैतिकता ,आडंबर खंडन ,सामाजिक समरसता सद्भावना ,संवेदना ,राष्ट्रीय एकता एवं भारतीय सनातन संस्कृति जैसे विषय रहे ।प्रेमचंद सदैव एक बेबाक साहित्यकार एवं उपन्यासकार रहे ।जमीनी सच्चाई से जुड़े रहने के कारण प्रेमचंद को एक कर्मठ कथाकार एवं सजग साहित्यकार कहा जाता है। वर्तमान साहित्यकारों एवं उपन्यासकारों को प्रेमचंद की लेखनी से काफी कुछ सीखने को मिलता है ।उनके उपन्यास हमारे लिए पथ प्रदर्शक का कार्य करते हैं। निसंदेह उनकी कमी हिंदी साहित्य जगत को सदैव खलती रहेगी ।उनके साहित्य के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान को हिंदी साहित्य जगत कभी नहीं भुला पाएगा।

मुंशी प्रेमचंद जी को समर्पित मेरी चंद पंक्तियां :

"कलम के सिपाही तुम

थे गुणों की तुम खान

तुम बिन साहित्य ऐसे

जैसे गात कोई निष्प्राण"


पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग दिल्ली