उत्तर प्रदेश सरकार की जनसंख्या नीति 2021-30 पर आइपीएफ का राष्ट्रीय राजनीतिक प्रस्ताव

लखनऊ। आरएसएस की विचारधारा से असहमत ढ़ेर सारे ऐसे उदारमना लोग हैं जो यह सोचते हैं कि सुधार का काम आरएसएस के लोग ही कर सकते हैं। मसलन सीमा विवाद, भाषा विवाद, जातीय विवाद आदि मुद्दों पर उनका यह सोचना है कि आरएसएस अपने उग्र समर्थकों को नियंत्रण में लेने की क्षमता रखती है और सुधार कर सकती है। हालांकि हकीकत अभी तक इसके उलट ही रही है। कश्मीर का मुद्दा इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। वहां लोकतांत्रिक अधिकारों के अतिशय दमन और राज्य विभाजन के बावजूद कश्मीर की समस्या हल होने की बजाए और उलझ गयी है और सीमा पर बढ़ता तनाव आरएसएस-भाजपा की कश्मीर नीति का एक परिणाम भी है। 

बहरहाल अभी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी जनसंख्या नीति 2021-30 के बारे में बात करें तो सुधार के इस कदम की नीति को भी समझ सकते हैं। बहुलता, परस्परता पर आधारित भारतीयता के खिलाफ एकात्म हिंदू राष्ट्र की वकालत करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सोच का बड़ा तत्व साम्प्रदायिक और निरंकुश ही रहता है। नीचे से जनता के बीच से कोई सुधार का भाव उभरे और लोग एक जवाबदेह नागरिक के बतौर हर सवालों पर व्यवहार करें, संघ के निरंकुश चिंतन प्रक्रिया में कभी नहीं दिखा है। 

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के ठीक मौके पर इस नीति की घोषणा पर अगर गौर करें तो इससे स्पष्ट होता है कि इसमें चुनावी चालबाजी के साथ-साथ डंडा के बल पर समाज को हांकने की नीति दिखती है। इस समय सूबे में कुछ ज्वलंत सवाल उभरकर सामने आए हैं मसलन कोरोना महामारी से निपटने के लिए सक्रिय स्वास्थ्य केन्द्रों को मजबूत करना, भुखमरी और महंगाई से पीड़ित  नागरिकों को सरकारी और जंगल की अतिरिक्त भूमि का आवंटन, ग्रामीण अंचल में मनरेगा को मजबूत करते हुए शहरों तक मनरेगा या मनरेगा जैसी योजना का विस्तार, निजी माफियाओं के हाथ से शिक्षा मुक्ति और हर नागरिक के शिक्षा के अधिकार की गारंटी, मजदूरों और कर्मचारियों को जिंदा रहने के लिए न्यूनतम वेतन, प्रदेश में खाली पड़े 5 लाख पदों पर भर्ती, काले कानूनों का खात्मा और लोकतंत्र के प्राधिकार की स्थापना सर्वोपरि चल रहे किसान आंदोलन के सी-2 के आधार पर एमएसपी का कानून लागू करना और गन्ना किसानों के बकाए का भुगतान करना जैसे ज्वलंत मुद्दे हैं इन पर चुप्पी साधकर जनसंख्या नीति 2021-30 का ऐलान उत्तर प्रदेश सरकार कर रही है जिसका कुछ अखबारों ने स्वागत करना भी शुरू कर दिया है। 

अब इस जनसंख्या नीति पर भी गौर कर लिया जाए। जमीनी सर्वे रिपोर्ट के आधार पर यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार अन्य की अपेक्षा सबसे अधिक है। वहीं आबादी के हिसाब से सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी नगण्य है और इस जनसंख्या नीति को अगर आधार मान लिया जाए तो वे नौकरी, पदोन्नति, वेतन वृद्धि, चिकित्सा, आवास आदि जैसे लाभ से वंचित हो जायेंगे। अभी जो वनाधिकार कानून है उसकी भावना के अनुरूप मायावती, मुलायम, अखिलेश और अब भाजपा की सरकारों ने आदिवासियों को जमीन पर अधिकार देने की जगह जमीन से उन्हें बेदखल ही किया है। माफियाओं द्वारा अवैध खनन जारी है। उनकी जमीनों पर भूमाफियाओं ने कब्जा किया हुआ है। 

हाल के वर्षों में हुआ उभ्भा कांड इसका बहुत बड़ा प्रमाण है।यह जरूरी नहीं कि आबादी विकास विरोधी ही हो बशर्ते उत्पादन प्रक्रिया में उसका बेहतर नियोजन किया जा सके। बेहतर तरीका यह है कि ऊपर से कानून बनाने की जगह महिलाओं और आदिवासियों के सशक्तिकरण पर जोर बढ़ाया जाए, उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर लाया जाए उनको नागरिक अधिकार दिया जाए तो वह खुद ही परिवार नियोजन करेंगी, परिवार छोटा ही रखेंगी। 

आज यदि अधिकांश मध्यवर्गीय परिवारों को देखा जाए तो महिलाएं एक बच्चे के ही पक्ष में दिखती हैं। सरकार की गलत नीतियों, कोरोना और महंगाई के कारण बड़े पैमाने पर लोग गरीबी रेखा के नीचे गए हैं। उन्हें कैसे आगे लाया जाए, उत्तर प्रदेश में नागरिकों के जान माल की रक्षा की जाए, रोजगार की गारंटी की जाए जैसे प्रदेश के प्रमुख मुद्दों पर उत्तर प्रदेश सरकार को अपना रूख साफ करना चाहिए। जनसंख्या नीति के नाम पर जनमुद्दों से भागने की इजाजत इस सरकार को नहीं देनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में विपक्ष को जनमुद्दों पर एक एजेण्डा तैयार करना चाहिए और उन सभी ताकतों के साथ एकताबद्ध होना चाहिए जिन्हें एकताबद्ध किया जा सके।