घर की बात

ठहरो, अभी मेरा अश्क पलकों के भीतर ही है। 

लोट आओ। घर की बात अभी घर के भीतर ही है।


माना की मैं औरत हूं। और तुम्हें मुझमें शर्म और वफा  

की भी जरूरत है। घर की बात अभी घर के भीतर ही है।


मुद्दतों से दिल भारी और आंख बोझिल है। दिल की बात लबों 

से बाहर नहीं गई है। दिल की बात अभी दिल के भीतर ही है।


जमाना क्या कहेगा।जमाना तो महफूज़ नहीं रखेगा।

बातों ही बातों में मार देगा और  रोने भी नहीं देगा।


ठहरो,  लोट आओ । दिल के घर को दिल की जरूरत है।

आंखों को पलकों की और लबों को लबों की जरूरत है।


दिल धड़कता ही नहीं तड़पता भी है। और यह कहना 

लाजमी भी है। यही तो बस अनहद प्रेम की परिणति है।


धड़कनों नें धड़कनों से मौन पर ऐतबार किया। लब

सह ना सके।पलकों नें अश्रुओं को धीरे से लुढ़का दिया। 


लोट आओ, घर की बात अभी घर में ही है।

घर की बात अभी घर में ही है।घर में ही है।


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

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