क्या हमने पहचाना है करोना को?

मिडिल स्कूल में संस्कृत मे कहानी आती थी।चार नेत्रहीन थे,जो हरेक चीज को छू करके पहचानते थे। एकदिन उसके मित्र ने हाथी के बारे में बात की,कुतुहल वश उन्हों ने हाथी को छू कर देखना चाहा,और मित्र ने  भी इंतजाम कर दिया और मंदिर ले गया जहां हाथी पल रहे थे। चारों को अलग अलग जगह खड़ा कर दिया,वो बड़े ही ध्यान से छू कर अपने चारो और हाथ घुमाने लगे।जो हाथी की सूंड(sundh)की और हाथ घुमा रहा था उसका मंतव्य था की हाथी मोटे से रस्से जैसा है।

     दूसरा जो हाथी के पेट की ओर था उसका मंतव्य था की मोटी सी दीवार सा है हाथी।

    तीसरा जो हाथी के एक पैर को छू रहा था उसके मंतव्य से हाथी एक खंभे सा है।

चौथा जो हाथी के कान को छू रहा था उसका मंतव्य था कि हाथी छाज ( सूप)सा था जिससे अन्न को झटका जाता है।

     अब चारों के खयाल हाथी के बारे में अलग अलग होने से विवाद हो गया ।आपस में खूब कहासुनी हुई।

    क्या हमारी हालत इस वक्त उन नेत्रहीन व्यक्तियो सी नहीं है,करोना के बारे मै? कुछ लोगो के हिसाब से ये छूने से,मुहसे निकले थूक के या भाप मैसे फैलते है।

 बाद में;आया हवा में से फैलता है ,और अब स्नानघर तक पहुंच गया, जहां बहुमाली मकानों में एक ही पाइप से स्नानघर का पानी निष्कासित होने की वजह से फ्लश करने के बाद जो गश उठता है टॉयलेट से उसमे वायरस हो सकता है अगर उपर वाले या नीचे वाले फ्लोर पे कोई  करोना संक्रमित व्यक्ति रहता है।

पता नहीं आगे क्या क्या संशोधित  होता है ।

स्वराचित रचना

जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद