तितलियाँ

आज कनिका को फिर से हर तरफ तितलियां नज़र आ रही थी। रंग बिरंगी खूबसूरत तितलियाँ। ऐसा लग रहा था कि तितलियाँ इधर उधर घूम रही हैं और साथ साथ उसके कानों में मधुर संगीत की स्वर लहरियां भी गूंज रही थी।

आज ऐसा बहुत सालों बाद हो रहा था शायद सत्रह साल तो हो ही गए होंगे जब उसने अपनी बेस्ट फ्रेंड रीना के घर सौरभ को पहली बार देखा था ।पता नही उसको देखते ही जैसे कनिका को नशा सा हो गया था मन करता था कि बस देखती ही रहे। जब वो बात करता तो वो तो बस उसकी बातें सुनते सुनते मदहोश ही हो जाती।

शायद यही  था उसका पहला प्यार..!!!

लेकिन किशोर उम्र का प्यार शायद प्यार नही मात्र एक आकर्षण होता है । ये तो उसको बहुत बाद में समझ आया। लेकिन तब तक वो जब भी सौरभ के बारे में सोचती उसको हर तरफ रंग बिरंगी तितलियां नज़र आती।

फिर उसकी शादी हो गयी। कई बार मन ही मन पापा पर बहुत गुस्सा भी आता कि एक बार उससे उसकी पसंद तो पूछ लेते।

लेकिन पापा की पसंद भी कोई ऐसी वैसी नही थी। हर तरह से हैंडसम ,स्मार्ट और सर्वगुणसम्पन्न थे राजीव जिनको पापा ने उसके लिए चुना था। 

एक लड़की को शादी के बाद जो चाहिए होता है वो सब उसे राजीव ने दिया। बहुत ठाठ की ज़िंदगी बसर कर रही थी वो। लेकिन फिर भी उसके हजार गुणों में से भी मन ही मन कोई न कोई दोष ढूंढ ही लेती।उसकी अच्छाई में भी बुराई तलाशती रहती।

और कल जबसे रीना का फोन आया था उसने उसको अपने नए घर के ग्रहप्रवेश के  लिए राजीव के साथ आने का न्योता दिया तो वो मना नही कर पाई।दिल के एक कोने में वो पहले प्यार की जो छवि  बसा रखी थी और एक बार उसको देखने के मोह से खुद को रोक नही पायी और नियत समय पर चल पड़ी राजीव के साथ।

लेकिन कल से जब से उसे ये अहसास हुआ था कि वहां उसकी सौरभ से मुलाकात होगी  फिर से हर तरफ रंग बिरंगी तितलियाँ नज़र आ रही थी।

जब उनकी गाड़ी कोलोनी के गेट से अंदर जाने लगी तो उनके आगे एक स्कूटर पर किसी कपल ने भी उसी रास्ते का रुख किया जिस तरफ वो जा रहे थे । हालांकि वो उनके चेहरे तो नही देख पायी । लेकिन उसने देखा वो भी रीना के घर पर ही जा रहे थे।

ग्रहप्रवेश की पूजा सम्पन्न होने के बाद जब सब लोग खाना खाने लगे तो रीना ने उसे बुलाया,"कनिका इधर आ देख तुझे किसी से मिलवाना है।पहचाना तूने ये हैं मेरे भईया सौरभ और मेरी भाभी अंजू।"

वो तो देखती ही रह गयी । अच्छा तो ये है सौरभ।अरे हां याद आया यही दोनो ही तो थे स्कूटर पर हमारी गाड़ी के आगे।वो तो एक दम से पहचान ही नही पाई।कितना बदल गया था सौरभ। ढीले ढाले कपड़ों में एक दम पतलू सा हो गया था। तितलियाँ जैसे एक दम शांत हो गयी थी।

फिर बातों बातों में पता चला वो किसी प्राइवेट कंपनी में नोकरी कर रहा हैं। बातें भी कैसे अजीब तरीके से कर रहा था और उसकी ड्रेसिंग सेंस तो कितनी अजब गजब थी।तितलियाँ जैसे चुपचाप किसी कोने में जा कर सो गई थी।कानों में संगीत की ध्वनि आनी बन्द हो गयी थी।

वापिसी में सारे रास्ते यही सोचती रही..हाय हाय कितनी बुधू थी मैं भी। इस घोंचू के लिए पागल हो गयी थी तब।  बहुत गर्व हो रहा था आज अपने पापा पर और बहुत प्यार आ रहा था अपने राजीव के लिए। कहाँ राजीव  हीरो जैसे हैंडसम एक कामयाब बिजनेसमैन ,शहर की एक जानी मानी हस्ती और  कहाँ वो। सारी जिंदगी मुझे उस खटारा वेस्पा स्कूटर पर ही घुमाता रहता।

आज तितलियाँ तो गायब ही हो गयी थी हमेशां हमेशां के लिए ।लेकिन उनके गायब होते ही हर तरफ रंग बिरंगे फूल खिल उठे राजीव के साथ उसके बहुत गहरे रिश्ते और भरपूर प्यार के फूल।


मौलिक एवं स्वरचित

रीटा मक्कड़