अख़बार

सुबह सवेरे बाबूजी को तलब लगी अख़बार की,

मिल जाये उसके संग चाय, कृपा हो सरकार की।


सुर्खियों में डीज़ल ,तेल और महंगाई की मार थी,

सेंसेक्स नीचे गिरा, हुई पतली हालत बाज़ार की।


 बच्चियों संग दुष्कर्म ,बाबा जी संग सुंदर नार थी,

वृद्धाश्रम छोड़ आये माँ को ,मानवता शर्मसार थी।


कोरोना, ब्लैक फंगस ,साँसे बनी व्यापार थी,

जुर्म,धोखा और  राजनीति की ही हाहाकार थी


आज़ादी की जंग में जो बनी प्रखर हथियार थी,

जिसके शब्दों में होती तलवार की सी धार थी।


राष्ट्रहित और देशभक्ति का जो करती प्रचार थी,

बाबूजी को है प्रतीक्षा आज उसी अखबार की।


तरुणा पुण्डीर 'तरुनिल'

साकेत, नई दिल्ली।