भारतीय संस्कृति

आज का युग आधुनिक युग कहा जाएगा, क्योंकि आजकल बहुत सी नई - नई टेक्नोलॉजी आ गई है , आज के इन्सान ने बहुत तरक्की है, इन्सान चांद तक पहुंच गया है, मगर फिर भी भारतीय संस्कृति अभी भी ज़िन्दा है।

मानव सभ्यता को कपास की खेती और सुती वस्त्र ही भारत की ही देन है । आदिकाल में तो मनुष्य जानवरों की खाल से ही तन ढकता था, इस तरह से देखा जाए तो आज के युग  में बहुत परिवर्तन आया है, और परिवर्तन प्रकृति का नियम है। लेकिन इस परिवर्तन में हमें अपनी संस्कृति, अपने संस्कार, अपनी सभ्यता नहीं भूलनी चाहिए । 

पाश्चात्य और आधुनिक में भी फर्क होता है ।  जैसे पहरावे को ही लें , पेंट ,कोट , शर्ट ,जींस इन्हें हम आधुनिक कहेंगे , पाश्चात्य नहीं , क्योंकि लगभग 2 दशक पहले के  पुरूष भारतीय संस्कृति का विशेष परिधान कुर्ता और पाजामा या धोती  संग  कुर्ता पहनते थे , और स्त्रियां साड़ी अथवा सलवार - सूट , घाघरा - चोली पहनते थे । घाघरा का स्थान लहंगा - चोली ने ले लिया है।

 किसी भी परिधान को पहनने से कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वो परिधान हमारी संस्कृति से मेल खाता है  अर्थात उस परिधान से हमारी संस्कृति , हमारी सभ्यता आहत ना हो। हमारी पहचान #भाषा , भेष भजन और भोजन "" से है  । अंग्रेजों और मुगलों ने हमारी भाषा और भेष को बदल दिया , आज हम पिज़्ज़ा - बर्गर , कोला , बियर इत्यादि बेशक पीते हैं , देशी खाने और तड़के तो कहीं लोप हो गए हैं, हर घर में बच्चों को केवल इंग्लिश बोलना सिखाया जाता है , इंग्लिश अंतरराष्ट्रीय भाषा है , लेकिन हमारी मातृभाषा हिन्दी है , और बहुत से घरों में अभी भी अपनी संस्कृति कायम रखते हुए हिन्दी ही सर्वोपरि है, बड़ों का आदर करना, बुज़ुर्गों के पांव छूना, हाथ जोड़ कर नमस्कार करना, ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है, और कायम है।

#मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अतिथि देवो भव अभी भी इनका महत्व समझा जाता है, धार्मिक ग्रंथ, पुराण घरों में विद्यमान है।

पाश्चात्य परिधान हो या पाश्चात्य विचार इसे अपनाने में गुरेज़ नहीं , अपितु हमें अपनी संस्कृति के साथ दूसरों की संस्कृति भी सीखनी चाहिए । लेकिन ये ध्यान रहे उससे हमारा कोई अपना आहत  ना हो।

आज कुछ परिवार ऐसे हैं जो किसी कारणवश अपने बुजुर्गो से अलग रहते हैं, लेकिन अभी भी बहुत से परिवार अपने बुजुर्गो के साथ रहना पसंद करते हैं, यही भारतीय संस्कृति है, मेरे देश की संस्कृति, मेरै भारत की संस्कृति, सदा सलामत रहे मेरे देश की संस्कृति।


प्रेम बजाज