रिश्तों में एंटी

एक राजस्थानी बनिए की पीढ़ी थी,सेठ का खूब कारोबार था ,लाखो की लेन - देन थी।दो पुत्रों और पुत्र वधुओ के साथ सेठ आनंद से रहते थे।कुछ सालों में पौत्रो का आगमन हुआ और सेठ खुशी से फूले न समाते थे।खूब मिठाईयां बांटी और जलसे आयोजित किए जिस में पूरा गांव आमंत्रित था।

        कुछ दिनों बाद सेठ जी रात को सोए और सुबह उठे ही नही शायद हृदय रोग ने उन्हें ग्रस लिया था।दोनो बेटे और बहुओं ने खूब शोक मनाया पर जानेवाले को भूलना ही पड़ता है।फिर जिंदगी ने रफ्तार पकड़ी, दोनों ही बेटे व्यापार कुशल थे,खूब उन्नति की कोठी बड़ी करवाई,दूर दूर तक व्यापार फैलाया,कभी एक भाई बाहर गांव जाता तो कभी दूसरा,वहा की मशहूर चीजे घर और बच्चो के लिए लाते थे।बस जीवन चल ही रहा था पर भाग्य में क्या लिखा था ऊपरवाला ही जाने।क्या पता था इतने प्यार वाले परिवार वालो के भी मन में कालिख थी।

    एक बार छोटा भाई काम के सिसिले में बाहर गांव गया था ,जैसे हमेशा कुछ न कुछ लाते थे, इसबार आम ले के आया था छोटा भाई,जैसे ही आया सामने से दौड़ के उसका बेटा और भतीजा  आ रहे थे,उसने टोकरी से दो आम उठाए और उनको प्यार से बुलाया,अब विडंबना ये हुई की जिस हाथ में छोटा आम था उस तरफ से उसका अपना बेटा आ रहा था और बड़े आल की और भतीजा।अब जैसे ही वो पास आए उसने अपने हाथ मे आंटी लगाकर छोटा आम भतीजे की और कर लिया और बड़ा आम अपने बेटे की ओर।ये सब उसके बडा भाई ने देख लिया ।दूसरे दिन भाई को बुलाकर बोल दिया की अब हमारा साथ रहना या व्यापार करना मुश्किल होगा, अच्छा है कि हम अलग हो जाए, बटवारा कर ले।छोटे भाई की समझ में कुछ नही आ रहा था पर अलग हो गए दोनो भाई।अब दोनो भाई की होशियारी से काम चल रहा था,एकदूजे के पूरक थे अब आधे रह गए।व्यापार में घाटा,फिर घर बिक गया और गरीबी ने आ घेरा ,मुफलिसी छा गई ,छोटे भाई की एक छोटी सी गलती से।

छोटी छोटी गलतियों का  कभी बहुत बड़ा जुर्माना भरना पड़ता है।

जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद