कहते है हम

नारी शक्ति नारी सम्मान।

फिर क्यूँ , पग पग पर,

झेले नारी अपमान।

आज भी वहशी दरिन्दे,

नारी को नोंच के खाते हैं।

हम मूक बधिर बन के,

बस बातें करते रह जाते हैं।

क्यूँ कुचली जाती है,

अस्मत नारी की बार बार।

थमता नही ये सिलसिला,

इन्सानियत भी हुयी शर्मसार।

हर गली मोहल्ले नुक्कड़ पर,

मौजूद है इक भेड़िया।

स्वतन्त्रता का तमगा है बस,

आज भी अबला के पैर मे,

जीवन्त है बेड़ियां।

इन बेड़ियों को तोड़कर,

गढ़ना है इतिहास नया।

भर के रंग सम्मान के,

पहनाना है लिबास नया।

चारू मित्तल,वरिष्ठ गीतकार कवयित्री 

व शिक्षिका स्वतंत्र लेखिका व स्तम्भकार,

मथुरा-उ०प्र०