मेरा ग़म कितना कम है

अस्पतालों में जब देखता हूं मैं

अत्यंत पीड़ा में

गंभीर बीमारियों से जूझते इंसान,

तो अपनी छोटी-मोटी बीमारियों से

हट जाता है मेरा स्वत: ही ध्यान,

अपने से ज्यादा तकलीफ़ पा रहे 

इंसान से मिलकर ही अपनी तकलीफ की

लघुता महसूस करता है इंसान।


सड़कों, फुटपाथों और अस्थाई 

झोंपड़ियों में जब देखता हूं मैं

अत्यंत गरीबी में

दो जून की रोटी को तरसते इंसान,

तो अपने कम आर्थिक संसाधनों में भी

भरे हुए पेट का थोड़ा होता है गुमान,

अपने से ज्यादा गरीबी में रह रहे

इंसान से मिलकर ही अपनी गरीबी की 

लघुता महसूस करता है इंसान।


खेतों, फैक्ट्रियों एवं विभिन्न कार्यस्थलों में 

जब देखता हूं मैं

अत्यंत कठोर परिस्थितियों में

आजीविका के लिए जूझते इंसान,

तो अपने काम की छोटी-मोटी परेशानियों से

हट जाता है मेरा स्वत: ही ध्यान,

अपने से बहुत ज्यादा मेहनती

इंसान से मिलकर ही अपनी मेहनत की

लघुता महसूस करता है इंसान।


युद्धों, बीमारियों एवं दुर्घटनाओं में

जब देखता हूं मैं

अत्यंत दारुण परिस्थितियों में

जान बचाने के लिए संघर्ष करते इंसान,

तो अपने जीवन की छोटी-मोटी तकलीफों से

हट जाता है मेरा स्वत: ही ध्यान,

एक मरते हुए इंसान को देखकर ही

अपने इस जीवन के अमूल्य होने का

सबक अच्छे से सीखता है इंसान।


जितेन्द्र 'कबीर'

संपर्क सूत्र - 7018558314