तुरबत पे मेरी तेरा नाम लिख गया

री मजबूरी को बेवफाई का 

नाम दे गया , 

कभी न मिले मुझसे वो कासिद

से कह गया । 

वक्ते रूख्स्त जबमेरा दुनिया 

से आ गया , 

अश्क दो बूंद गिरा कर दुश्मन 

अहसान कर गया ।

याद न करना खाओ कसम ,

वादा वो ले गया , 

तन्हाई का था सामान वो भी 

छीन कर गया ।

किस - किस को रोकेंगे और

करोगे जुबान बंद ,

फिर कोई मनचला तुरबत पे मेरी 

नाम तेरा लिख गया । 

दुनिया भी गई हाथ से , आखेरत 

भी गई " मुश्ताक ' 

मैं भी बड़े यक़ीन से देखिए खुदा 

उसको कह गया ।


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

"सहज़"

हरदा मध्यप्रदेश