चांद क्यूं ख़ामोश है

ये शमां आज मदहोश क्यूं है..

टूटा हर गुरुर आज है..

चांदनी भी है कुछ खफा खपा...

चांद आज़ क्यूं ख़ामोश है !

तन्हाई है आस पास..

प्रेम खुशबू नहीं है पास..

अपनी ही वफ़ा से है खफा..

छुपा लिया है सीने में हर वो..

बात वो लम्हा..

फिर ये चांद आज़ क्यूं ख़ामोश है !

चांदनी में नहाई हर फिज़ा है..

मैं यहां हूं..

तो फिर तुम कहां हो..

चांद आज़ क्यूं ख़ामोश है !

मुहब्बत के सफ़र में हर नज़्म जायज़ है..

बेपनाह इश्क का सितारे गवाह हैं..

फिर आज़ ये..

चांद ख़ामोश क्यूं है !


स्वरचित

रीता मिश्रा तिवारी