एक चादर

बस एक चादर सी बन बिछती रही सदा तेरे लिए, कभी मन से, कभी बेमन सी, ना जाना कभी तुने मेरे अहसासों को, मेरे दिल में पनाह लेते अरमानों को।

लाल, पीली, हरी , नीली रंग जानकर आए तुम पास मेरे,  खद्दर, सिल्क, रेयान, काॅटन कभी लिनन जान तुमने सहलाया मुझे,मेरा अपना क्या वजूद ये तो कभी भी जान ना पाए तुम, क्या रंग है मेरा ये भी ना देख पाए तुम।

कभी मेरे वजूद से ना जाना, ना छुआ तुमने, जाना तो ग़ैर के वजूद को ज़हन में रखा सदा तुमने।

कभी मुझे मेरा भी अहसास दिलाओ तुम, कभी मुझे मेरे रंग से भी पहचान कराओ तुम,कभी तो केवल मुझ पर ही छा जाओ तुम, कभी जान मेरा वजूद मेरे पास आओ तुम।

क्या मैं हमेशा दूसरों के वजूद में ही ढली रहूंगी? क्या कभी मैं अपना रंग-रूप, वजूद नहीं जान पाऊंगी?  मैं जैसी भी हूं काली हूॅं या सफेद हूॅं, मैं तो मैं हूॅं, मुझे भी उसी जुलाहा ना घढ़ा है, औरों को घढ़ा है, फिर मुझमें और उनमें ये भेद कैसा?

  ये भेद तो तेरी नज़र का है, जुलाहे का नहीं, खेल सारा तकदीर का है, कसूर तेरा भी नहीं।

प्रेम बजाज