दो मुट्ठी गेहूं

 मैंने देखा एक व्यक्ति ,

जो जा रहा था पथ पर।

वेशभूषा फटे उसके कपड़े, 

पर था वह बिल्कुल स्वस्थ ।

मेरे पास थे दो मुट्ठी गेहूं ,

उसने लिए गेहूं मांग ।

मैंने इंकार कर दिया,

 क्यों दूं मैं गेहूं भला।

 हष्ट पुष्ट हो तुम स्वस्थ ,

जाकर करो कार्य तुम।

 फिर मिला बूढ़ा व्यक्ति ,

बोला मुझे दो यह गेहूं ।

मैंने दिया कर इनकार

 परिवार में करो आराम।

 न घूमो तुम यूं व्यर्थ ,

तुम्हें है सेवा की जरूरत।

 पर दोनों ही ने बुरा माना ,

उनका मैंने क्या बिगाड़ा ।

फिर आए दो बालक,

 बोले हमें दे दो यह गेहूं ।

मैंने कहा नहीं बालक

 तुम्हारे तो हैं पालक ।

पढ़ो लिखो जरा कुछ ,

न घूमो तुम ऐसे पथ।

 बस मैं सोच ही रही थी,

 एक जगह रुक खड़ी थी ।

मैंने एक सिंहासन देखा,

 जो सोने का था बना ।

उस पर एक व्यक्ति था ,

उसका तेज सूर्य सा था ।

वह रथ से उतर आया ,

बोला मुझे दो यह गेहूं ।

मैंने कहा तुम तो हो राजा ,

तुम्हारे पास तो है खजाना ।

क्यों चाहिए तुम्हें दो मुट्ठी गेहूं,

 शर्मिंदा न करो मांग ये गेहूं ।

जब उन्होंने की बहुत जिद,

 तो मैंने दिए एक मुट्ठी गेहूं ।

अब वह राजा मुस्कुराया,

 और गेहूं को  बिखराया ।

अरे चमत्कार ही हो गया,

 वहां गेहूं का ढेर लग गया।

 भिखारी बूढ़ा व्यक्ति बालक,

 सभी थे थैलों को भरने लगे।

 इतना ढेर था जो नहीं घटा,

 बढ़ता ही रहा था वह जा ।

अब मेरी समझ में आया,

 वह कोई नहीं ईश्वर था।

अगर मैं सारे गेहूं दे देती,

तब कितनी वृद्धि होती।

 मेरा स्वप्न था टूट गया,

 मुझे स्वप्न समझा गया ।

देने से कुछ नहीं घटता,

 बल्कि नियत से है बढ़ता।

 अच्छी होनी चाहिए नियत ,

भर जाते हैं फिर भंडार।

 ईश्वर हमारी लेता परीक्षा,

 क्या वह नहीं दे सकता भिक्षा ।

ईश्वर ही तो हमें देता है ,

फिर भी वह परीक्षा लेता है ।

ईश्वर तेरी सदा जय हो,

जय हो जय हो जय हो। 

पूनम पाठक बदायूँ