देखा

फादर्स डे पर बाप के प्रति,

बेटे का प्यार उमड़ते देखा।

बाकी दिन बूढ़े बाप को, 

भोजन के लिए तरसते देखा।।

वही बाप जिस बेटा को

कंधों पर ढोया था।

बुढापा के लिए बीज,

सपनों का बोया था।।

सुख अपना गिरवी रखकर,

बेटे लिए क्या नहीं किया।

बेटे के उज्जवल भविष्य को,

क्या योगदान नहीं दिया।।

बाहर ‌बैठका के कोने में,

खाट बाप की पड़ते देखा--

बाकी दिन बूढ़े बाप को----

बेटा‌-बहू के स्वर में स्वर,

बुढ़ी महतारी मिला रही‌ है।

पेट अधम के खातिर जाने,

घर में टहल बजा रही है।।

पहले की हाथों से सिली हुई,

लेवनी बिछा ज़मीन पर सोती है।

फटी लुगरी से ढांप मुंह,

अपने दुर्दिन पर रोती है।।

थोड़ी सी गलती‌ होने पर,

हर किसी को बिगड़ते देखा।

बाकी दिन बुढ़े बाप‌को,

भोजन के लिए तरसते देखा----

मैं बाज़ार गया था कामों से।

जब गुजरा संकरी राहों से ।।

फिसल कर गिरी पड़ी बुढ़िया को,

दिया सहारा बांहों से।।

घर तक पहुंचाया चलकर,

ढेरों आशीर्वाद मिला।

मेरे चलें आने पर छोटे,

बच्चों को कुछ कहते‌ देखा।

बाकी दिन बूढ़े बाप को,

भोजन के लिए तरसते देखा---

जबसे पिताजी पापा बनकर,

पाप द्वय का मेल बने।

अरमान टूटकर बिखर गए,

कठपुतली वाला खेल बने।।

पश्चिमी देशों की हवा है हाबी,

संस्कार को मिटते देखा।

बाकी दिन बूढ़े बाप को,

भोजन के लिए तरसते देखा--

-गौरीशंकर पांडेय'सरस।