धन का पर्यावरण

भू  भूमि  धरा   जाने  कितने  नाम   दे  दिये,

रक्षा माँ की न  कर पाये  ऐसे काम हैं  किये।

मां ने प्रेम से पाला कहा दुल्हन सा सजा दो,

नहीं कहा आँचल ही उनका तन से उड़ा दो।

जग में जब आये तुम माँ गर्वित थी स्वयं पर,

हरियाली बिछी राहें और फूल थे शाखों पर।

पर नाम के हो सुत मानस में स्वार्थ ही कौंधा,

जाने  अनजाने  माँ  का आँचल  ही  है रौंदा।

हिम शिखरों को तोड़ा धार नदियों की रोकी,

उदर  फाड़ कर माँ का कील सीने पर ठोकी।

फैलाये  अपने  पैर  कि  जंगल  जला   दिये,

सागर  की  गहराई  में भी बवंडर  उठा दिये।

धन  धान्य  माँ ने तुमको जी भरके था  दिया,

तुमने  उसी  की  पीठ पर खंजर चुभा  दिया।

कर्मो  से  अपने  सुखा दिये  धरती के निर्झर,

सांसों  की  हवा खो गई भूमि  रही  न  उर्वर।

जिस  आवरण से  घिर  के रहते थे  धरा पर,

पर्यावरण   प्रदूषित  आज हुआ  है  वहीं पर।


सीमा मिश्रा,वरिष्ठ गीतकार कवयित्री व शिक्षिका,स्वतंत्र लेखिका व स्तम्भकार,

बिन्दकी-फतेहपुर,उत्तर प्रदेश