"वो अपने जन्म के हादसे पर मायूस है"

क्यूँकि वो उस घर में जन्मा है जहाँ चटाई की तुरपाई करके दीवारें बनाई गई थी, और छत के नाम पर पेड़ो की टहनियों को बिछाया था, आस-पास कूड़े कचरे का ढ़ेर था इस आलिशान आशियाने पर कभी भी बुलडोज़र फिर जाने का ख़तरा था। आग उगलती गर्मी, हड्डियों को थिजाने वाली ठंडी और धुआँधार बारिश से बचाए ऐसी इस झोंपड़ी की औकात न थी।

यहाँ गिफ़्ट मांगती बहन न थी, न सबको संबल देता भाई था, थी तो बस रोटी के टुकड़े की आस लगाए टिमटिमाती कुछ आँखें थी। रोजगार ढूँढता बाप था और सालों से दो फटी साड़ी में लिपटी माँ थी। "एक चूल्हा तो था, शांत शीत आग के इंतज़ार का मारा" पर चूल्हे के हिस्से की आग सबके पेट में जल रही थी। उसके घर से निकलती कोई भी राह स्कूल का रुख़ नहीं करती थी। बस जाती थी तो भीख मांगने मंदिर की ओर या दूसरी दारु के ठेले की ओर। हर तरफ़ ब्लेक एंड व्हाइट मंज़र था कहीं कोई रंगीनियों का माहौल नहीं था।

वो उस देश में जन्मा था जहाँ आर्थिक असमानता की बहुत गहरी खाई थी।

एक और मखमली पर्दे झूल रहे है तो दूसरी और कुछ लोग नंगे तन लिए भटक रहे है। एक ओर दावतें सजती थी तो दूसरी ओर भूखे पेट से बहती आग की लपटें उठ रही थी। एक तीसरा वर्ग इन दो पाटन के बीच पिसता अपना अस्तित्व बचाने की ख़ातिर जद्दोजहद कर रहा था लोग उसे मध्यम वर्गीय परिवारों का उपनाम देते थे।

वो वहाँ खड़ा जहाँ धर्मांधता की मशाल हाथ में लिए घूम रहा था धर्म के ठेकेदारों का मजमा और दूसरी तरफ़ सियासती शतरंज बिछी थी। एक ओर भ्रष्टाचार का लगा था मेला और दूसरी तरफ़ बेरोजगारी मुँह खोले खड़ी थी।

दुन्यवी मेले में न उसका कोई स्थान था न इज्जत की धूप पड़ी थी। वह सोच रहा है उसे लड़ना होगा अपने वजूद को प्रस्थापित करने की ख़ातिर हर मोर्चे पर। दूर-दूर तक मंज़िल कोई नज़र आती नहीं सदियों से शायद इस कूल की पीढ़ियां भटक रही है पर दरवाज़े सारे बंद है। उसे  जंजीर तोड़नी होगी। वह सोच रहा है क्यूँ आया है दुनिया में? उसकी लकीरों का दोष है, माँ बाप की एय्याशी का नतीजा है या सामाजिक व्यवस्था का शिकार हुआ है। आँखों में उम्मीद तो है मन में हौसला भी लाँघनी है उसे क्षितिज असमानता की पर कैसे? भूख से निपटे की ज़िंदगी की दी हुई चुनौतियों से। 

फ़िलहाल तो बंदा कश्मकश में घिरा खड़ा है संघर्ष रत कहानी की शुरुआत कहाँ से करूँ।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु