"ये अनमना समय"

इंसान कितना भी चाहे समय अपनी छाप दिलो दिमाग पर छोड़ ही जाता है। ये समय जो आज अपना अनमना पहलू दिखा रहा रहा है उससे कोई नहीं बच पाया। कोरोना की वजह से सोशल डिस्टंस और लाॅक डाउन ने इंसानों को सिर्फ़ आर्थिक और मानसिक रूप से ही परेशान नहीं किया, सुखी दांपत्य जीवन जी रहे दो लोगों के शारीरिक संबंध पर असर करके दिलों में दूरियां भरकर डिस्टंस पैदा कर दिया है।

शीतल और सागर लगभग सुखी दांपत्य जीवन जी रहे थे सागर प्राइवेट कंपनी में  हेड क्लर्क की नौकरी कर रहा था शीतल के सपने थोड़े ऊँचे थे, पर सागर की आय इतनी भी नहीं थी की शीतल को हाईफाई लाइफ़ स्टाइल दे सकें। इस वजह से शीतल थोड़ी असंतोष लिए जी रही थी। इतने में कोरोना के कहर के चलते लाॅक डाउन लग गया, कई कंपनियों ने अपने एम्पलोयस को छूटा कर दिया, उसमें सागर को भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। उस वजह से सागर अवसाद का भोग बन गया। 

आर्थिक तंगी ने मानसिक तौर पर भी निकम्मा कर दिया। कहीं जी नहीं लगता सागर थोड़ा चिड़चिड़ा भी हो गया। ऐसे में शीतल को छूना तो दूर करीब जाने से भी कतराने लगा। शीतल वैसे भी विजय से खुश नहीं थी.... मानसिक तौर पर डिप्रेश शीतल कुछ पल खुशी के ढूँढते सागर के साथ छेड़-छाड़ करते कोशिश करती सागर के नज़दीक जाने की, पर सागर बहाना बनाकर परे हो जाता और शीतल समुन्दर के इतने करीब रहकर भी खुद को प्यासा महसूस करती। 

जवान तन की और भी जरूरतें होती है। ऐसे में एक दिन सागर बाहर से आया तो शीतल को पड़ोसी के लड़के के साथ अजीब हालत में देख लिया तो सागर गुस्से से आगबबूला हो उठा। शीतल तुझमें शर्म नाम की चीज़ है कि नहीं ये क्या कर रही हो। मेरी इज्जत का कुछ तो ख़याल करो। इतना सुनते ही शीतल भी चिल्लाई मिस्टर सागर एक साल हो गया, आख़िर मैं भी इंसान हूँ पेट की भूख के साथ इंसान को तन की भूख भी जलाती है समझे। तुम तो नौकरी के चक्कर में आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रुप से बिलकुल हार गए हो मैं अपनी कामेच्छा को कैसे दबाऊँ। जवान हूँ, खूबसूरत हूँ मेरे दिल में भी अरमान है तुमने आज तक मुझे दिया ही क्या है, अपने शौक़ मारकर आज तक पैसों की तंगी तो बरदाश्त करती रही। सोशल डिस्टंस को तुमने कुछ ज़्यादा ही सीरियस ले लिया, तुम तो भूल ही गए की शादीशुदा हो, जवान बीवी की भी जरूरतें होती है। एक साल से तुमने मुझे छुआ नहीं मेरी भावनाएं तड़प रही थी तो क्या करती बताओ? सागर को अपनी गलती का अहसास हो गया शीतल सही थी, अपने मानसिक तनाव को शरीर पर हावी करते मैंने शीतल के साथ अन्याय किया। आज महामारी और लाॅक डाउन ने हर एक के जीवन में अवसाद भर दिया है एक मैं ही तो समय का मारा नहीं, ये समय भी गुज़र जाएगा इसके चलते दिलों में दूरियां बना लेना ठीक नहीं। अपनी भूल कुबूल करते विजय ने वंदना को बाँहों में भर लिया और सौरी बोलते नम आँखों से इश्क का समुन्दर प्यासी नदी पर बरस पड़ा।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु