यूं ही बस रिश्तों को निभाते हैं हम

संबंधों का धागा बुन, भावनाओं की सुई चुन।यूं ही

कभी तुरपन तो कभी रफू तो कभी बखिया उखाड़ें ।

मोतियों को धागे में पिरोकर रिश्तों की माला बनायें।

मोतियों से बिखर ना जायें। माला से संवर जायें हम।


संबंधों का ईंट, मिट्टी-गारा।रंगाई चुनाई करता जतन।

रिश्तों की मजबूत दिवार।अपने पन का अर्श और

साफ सुथरा फर्श।क्या खूब कमाल कर गया।और 

पता नहीं हम घर बन गये या हमीं से घर बन गया।


आंवला, नींबू ,संतरे की खटास का अहम ।अथवा

ना कोई आम, जाम, जामुन से मीठेपन का वहम ।

अब ना रही आंख के पर्दे की शरम।ऐसे बेशरम भी

ना रहे हम।हम तो रिश्ते हंस कर निभाते हैं सनम। 


कभी खट्टे तो कभी मीठे रिश्तों को चाकू की धार से

तराश कर। संबंधों को आटे सा गूंथ कर।रोटी की 

सेज सजा,सब्जी का तकिया लगा।पेट की आग 

बुझा रिश्तों की खट्टी - मीठी कढ़ी बनाते हैं। हम 


यूं ही बस रिश्तों को निभाते हैं हम।


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

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