इतंजार कर लेंगे

आतिशे-ग़म ना पूछ, जुदाई में यार की जो रोया मैं,  ख़्याल आया जब-जब यार का ऑंखों में अश्क बेशुमार आए।

दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहे हम शब-भर, वो सांसों की तरह आते रहे-जाते रहे शब - भर, मौजू-ए-गुफ्तगू तो कुछ भी ना था, ता-उम्र रहे नज़रों में उनकी ख़तावार बन कर।

हुकूमते-इश्क ना चाहा कभी हमने, निगाहे-जमाल की तमन्ना ही तो की थी, काफ़िर नहीं हैं हम, महबूब की बंदगी की थी, चाही थी वफ़ा, बदले में वफ़ा के, ले लिया था ग़म सारा, अपनी सारी खुशी दी थी।

आजमाईश वो मेरी करते रहे, वो करते रहे दिल्लगी हमसे, हम दिल में उनके लिए मरते रहे, उल्फ़ते-जाम वो पिएं ना पिएं, कोई उनसे कह दो यूं गिराया ना करें।

सहे जा रहे हैं हम जुर्म-ए-उल्फ़त की सज़ा, ऐ खुदा जहां गुनाह नहीं होता, कोई तो ऐसी जगह बता,  ता-उम्र हम उनका इंतजार कर लेंगे, प्यार ना मिला तो नफ़रत का इंतजार कर लेंगे।

ज़रूरी तो नहीं सबको प्यार हासिल हो, इंतजार करना दमे-आखिर तक कोई गुनाह तो नहीं, बना ना रफ़ीक वो मेरा क्यूंकि वो मेरी तहरीर में ना था ,हुस्न बन गया सैयाद राहे- शौक़ में, सबब ना जाना मेरा इंतजार का क़ज़ा का हुक्म सुना दिया।

प्रेम बजाज