यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः

हर बंदे को अपनी कुलदेवी,शक्ति  की आराधना कर चुन्नी चढ़ाने की एक आस्था,एक चाह हमेशा रहती है।हम माता के मंदिर जाके चुन्नी चड़ाके भोग लगाते है मातारानी ,को प्रसन्न करने के लिए। 

      वो भोग,चुन्नी और चढ़ावा मंजूर नहीं होता जब तक घर में हाजीर चार शक्तियों का मान–सम्मान नहीं रखते। उसमे पहला स्थान मां का है,जिसने ९ महीने अपने पेट में पाला और पिड़ओ में  भी खुशी खुशी जन्म दिया,ये एक ही कारण ऐसा है कि अस्पताल में जाने और आने में खुशी का अनुभव होता है और शारीरिक पीड़ा में भी मन मुस्काता है।बच्चे के लालन–पालन से ले कर उसकी हरेक जरूरत को दिल से महसूस करना और बच्चे की हरेक तकलीफ में बिना थके उसकी सेवा करना , वो भी घर सारी जिम्मेवारियों के साथ। मां के बारे में लिखेंगे तो एक ग्रंथ बन जायेगा,ऐसी मां को अगर हम सुख नहीं दे पाए तो शायद ही मातारानी आपकी चुन्नी स्वीकारेगी।

  दूसरी बहन है,जो भाई बड़ा हो या छोटा ,बहन के प्यार और परवा का कोई मोल नहीं होता।कितनी भी लड़ाई हो ,पर भाई की गलती पर माता–पिता से बचाती है भाई की और आर्थिक तंगी में फाइनेंसर वोही तो होती है।बिन बोले भाई की मुश्किलों को समझ ने वाली वोही तो है।रखी  टिके की राह में हमेशा रहने वाली बहन अगर खुश नहीं तो शायद माता रानी को रिझाना मुश्किल ही होगा।

  तीसरी शक्ति है धर की लक्ष्मी,सर्व शक्तिमान होते हुए भी सब की सेवा में तत्पर,आर्थिक,सामाजिक, कौटुंबिक सारे ही प्रश्नों को हल करने की महारत वाली भार्या को खुश नहीं रख पाते हो तो माता रानी को रिझाने का कोई मतलब ही नहीं है।

      चौथी और अति महत्वपूर्ण बेटी, मां के लिए उसका बचपन है बेटी,बचपन बेटी बनकर आता है।अपनी सारी आधी अधूरी ख्वाहिशें उसी में पूरी करने की चाह होती है।पापा की तो जान होती है बेटी , मां, दादी ,नानी सब का प्रतिरूप हो जाती है।ये भावना एक बेटी का पिता ही समझ सकता है।पति से कुछ ऐसी बात मनवानी है तो मां बेटी द्वारा ही करवा सकती है।दादी –नानी की लड़ो है ये।शौकीन गुड़िया सी साज श्रृंगार और घर की रौनक है बेटी।अगर उसे खुश नहीं रख पाए तो शायद माता रानी  का प्रसन्न होना तो एकतरफ नाराज़ हो जायेगी।

     वैसे भी ब्रह्माजी के दरबार में भी सब खाते स्त्री शक्तियों के पास ही है,विद्या सरस्वतीजी,धन लक्ष्मी जी,सुरक्षा दुर्गा और महाकाली मां, धान्य अन्नपूर्णा मां,  नारी शक्ति  को लाख लाख नमन।


जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद