शाम तो ढल जाने दें ...

जुल्फों की घनी छाओं की

चाहत है दो घड़ी ,

कुछ पल ही सही दिल की

गहराई में उतर जाने दें । 

आंखों से तेरी , थोड़ी मैं 

पीलूं तो बुरा क्या है ,

मैं हूं मदहोश थोड़ा सा 

मुझको भी बहक जाने दें,

मैखुद ही चला जाउँगा , 

हूं मुसाफिर तन्हा - तन्हा , 

अभी सूरज भी नहीं डूबा 

जराशाम तो ढल जाने दें ,

आतिशे ईश्क है ऐसे न,

बुझेगी अब मुश्ताक

अपने होठों को मेरे होठों केे

करीब तो आजाने दे,


डॉ.मुश्ताक़ अहमद  शाह , 

सहज़, हरदा मध्यप्रदेश