घर के युग पुरुष

क्या हमने कभी सोचा है, कौन है ये युगपुरुष?जी हां ये पापा,पिता,बाउजी, डैड कुछ भी कहो ये वही है जो बिन बोले सब कर देते है और बीन कहे सब सुन लेते है।

       बेटा हो या बेटी पापा तो वही है,एकदम ही जाजरमान और धीर।शाम को दफ्तर से आते कुटुम्ब के हर सदस्य के लिए उसकी जरूरत की चीजों से लदे घर पहुंचते है तो लगता है कल्पवृक्ष आ पहुंचा हो घर।

      मां तो कभी बोल भी देगी अपने भावनाओं को पर इनके तो सीने में खुशी और गम दबे रहते है।खुशी तो जिव्हा को छोड़ आंखो से दिख जाती है पर गम तो सीने तक ही सीमित।

        एक सबल खंभा है जो घर की हरेक जिम्मेवारी,जरूरत इत्यादि अनकहे ही पूरी कर देता है।

अपने माता पिता,पत्नी और बच्चों की भावनाओं का खयाल रखते हुए भी एक आंख करारी रख कर घर की परिस्थितियों को नियंत्रण में रखना ये उनका  एक श्रेष्ठ गुण है।

  ये वो पेड़ है जो घर को छांव देने के लिए खुद  कड़ी धूप सहन करने वाले पिता की कद्र तब होती हैं जब हम उनसे दूर हो जाते है। छांव की कीमत धूप में ही होती है, छांव में हो तब तक तकलीफ का पता ही नहीं लगता।शादी ब्याह में सजे धजे बारातियों में सब से बाद में तैयार होने वाले भी तो वही होते है क्योंकि उनको ही सब  इंतजाम करना होता है ।समझो एक विशाल वटवृक्ष है जो पूरे परिवार को अपनी छांव में समेटे रखने वाले पिता को शत शत प्रणाम।


जयश्री बिरमी

अहमदाबाद