परिवार

ये शब्द लिखते पढ़ते बोलते सुनते ही हम सभी के मस्तिष्क में दादी दादा,माता-पिता ,भाई-बहन ,चाची चाचा इत्यादि, इन सब की तस्वीर यकायक आंखों के सामने घूम जाती है।

परिवार शब्द सुनते ही एक सुरक्षा की भावना खुद ब खुद एहसास होने लगता है साथ ही यह भी लगता है कि हमारा कोई अपना है और हम भी किसी के लिए महत्वपूर्ण हैं। परिवार में हम सब एक दूसरे के संगी साथी होते हैं, एक दूसरे की खुशियों और मुसीबतों को साझा करते हैं। एक अलग ही सुकून और मानसिक शांति सभी परिवारजनों को परिवार के साथ रहते हुए महसूस होती है।

लेकिन दोस्तों ,जब यही परिवार आपको खुशियां देने के बजाय तनाव देने लगे तो परिवार का क्या अर्थ रह जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि परिवार तो खुशियां देने का नाम है, सुख देने का नाम है तो परिवार से तनाव किस प्रकार का तो दोस्तों यहां मैं बताना चाहूंगी कि जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप जब आपकी जिंदगी में किसी और का होने लगता है और अगर वह सभी सीमाएं लांघ जाता है तो आप उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और यह 100% सत्य है।बड़े परिवारों में रहने का दंभ भरने वाले अनेक ऐसे लोगों से मैं स्वयं परिचित हूं जो खुद आपबीती सुनाते हैं परंतु माता पिता के दबाव के चलते अथवा संस्कारवश आज भी न्यूक्लियर फैमिली में रहने की सोच तक नहीं पाते हैं। खैर बात संयुक्त परिवार या एकल परिवार की नहीं है ,बात विचारों की है विचारों की भिन्नता की है।

विचारों की भिन्नता यहां मुख्य भूमिका निभाती है जरूरी नहीं है कि घर के सभी सदस्यों की विचारधारा एक जैसी हो और यह समस्या तब ज्यादा गंभीर हो जाती है जब परिवार में सदस्यों की संख्या काफी अधिक होती है। ऐसी स्थिति में तनाव उत्पन्न होना स्वभाविक ही है ।यहां कहने का तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं है कि तनाव सिर्फ बड़े परिवारों में ही होते हैं परंतु जितने अधिक लोग होंगे तर्क वितर्क भी उतने ही होंगे और तर्क वितर्क कब बहस में परिवर्तित हो जाते हैं पता ही नहीं चलता ,जिसके परिणाम स्वरूप तनाव की समस्या उत्पन्न होने लगती है।

चलो ,तनाव की भी छोड़ें, तो आज के युग में जहां दिन प्रतिदिन बढ़ती महंगाई सभी आय वर्ग के लोगों के लिए कमरतोड़ साबित हो रही है ,वहां अगर परिवार में सदस्यों की संख्या काफी अधिक होती है तो परिवार का निर्वाह करना कठिन हो जाता है विशेषकर, उन परिवारों में जहां कमाने वाला एक और उस पर निर्भर रहने वाले सदस्यों की संख्या काफी अधिक होती है। यह समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप लेने लगती है और पारिवारिक स्तर से नगरीय स्तर पर और उसके बाद राज्य एवं तत्पश्चात राष्ट्रीय स्तर तक हानिकारक सिद्ध होती है।

भारत जैसे विकासशील देशों में जहां संसाधनों की वैसे ही बहुत कमी है और कुछ संसाधन तो बहुत ही सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं, वहां निरंतर बढ़ती जनसंख्या देश की प्रगति और विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है।

देश को प्रगति के मार्ग पर ले जाने के लिए सरकार ने परिवार नियोजन नीति अपनाई है यह नीति सभी भारतीयों पर बिना किसी रंग ,जाति ,वर्ण और धर्म के भेदभाव के समान रूप से लागू होती है।

दोस्तों यदि सरकार हमारे देश के बारे में ,हमारे देश के विकास के बारे में ,देश की प्रगति के बारे में सोच सकती है तो हम क्यों नहीं ?क्या हमारा फर्ज नहीं है कि हम अपने देश की उन्नति में सहयोग करें ,अपने स्तर पर हम जो योगदान सरकार की इस मुहिम को सफल बनाने के लिए दे सकते हैं हमें देना चाहिए। और सरकार ने परिवार नियोजन की जो मुहिम चलाई है वह हम सबके कल्याण के लिए ,हम सब के विकास के लिए ही तो चलाई है ,ताकि अपने संसाधनों में रहकर हम अपने और अपने परिवार को एक बेहतर जिंदगी दे पाएं।

संसाधन सीमित हैं तो क्या हुआ,हमारे प्रयास सीमित नहीं होने चाहिएं। अपने असीमित प्रयासों से ,सतत प्रयत्नों से हमें सरकार की इस मुहिम को सफल बनाना है और देश को विकासशील देशों की श्रेणी से हटाकर विकसित देशों की श्रेणी में लाना है।

अब बुद्धिजीवी वर्ग के कई लोगों की इस विषय पर दलील यह होगी कि यह तो ईश्वर की नेमत है ,बच्चे ईश्वर की देन होते हैं और परिवार नियोजन जैसी नीतियां व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कुठाराघात करती हैं। इसलिए ईश्वर की कृपा समझ कर हमें बच्चे पैदा करने पर रोक नहीं लगानी चाहिए ,अर्थात ईश्वर की कृपा जितनी बरसती है बरसने देना चाहिए। यहां मैं अपने उन बंधु बांधवो से कहना चाहूंगी कि उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि बच्चे भगवान की नेमत होते हैं भगवान की कृपा होती है ।परंतु समझने वाली बात यह है कि बच्चों के लालन-पालन और उनके भरण पोषण के लिए भगवान स्वयं तो अवतरित नहीं होंगे। बच्चों की खान पान,कपड़े,शिक्षा , स्वास्थ्य आदि सभी का जिम्मा एक अभिभावक होने के नाते हमारा होता है और अपने सीमित संसाधनों में असंख्य बच्चों का भरण पोषण किस प्रकार किया जा सकता है यह शायद मुझे यहां बताने की जरूरत नहीं है।

यहां मैं कहना चाहूंगी कि यदि आवश्यकता पड़े तो सरकार को परिवार नियोजन ना करने वाले दंपतियों के लिए नॉमिनल सी सजा का प्रावधान भी करना चाहिए। वैसे ही विश्व में भारत का नाम जनसंख्या के मामले में अव्वल देशों में गिना जाता है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या और परिवार नियोजन को सीरियसली ना लेने की वजह से ही हमारा देश अभी तक विकसित देश नहीं बन पाया है। देश को आगे बढ़ाने और विश्व स्तर पर एक अलग पहचान बनाने के लिए सरकार के अथक प्रयासों को सफलता तभी मिल पाएगी जब हम सब भारतीय मिलकर सरकार को सहयोग करेंगे और सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों को दिल से स्वीकारेंगे और उन पर अमल करेंगे, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब भारत विकासशील देश के स्तर से गिरकर अल्प विकसित देशों की श्रेणी में गिना जाने जाने लगेगा।

परिवार नियोजन को दिल से अपनाओ यारो

समय रहते क्यों न संभल जाओ यारों...


पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग दिल्ली