कथनी और करनी में अंतर

हम नदियों को 'मां' बुलाते हैं,

फिर दुनिया भर की गंदगी,

फैक्ट्रियों के रासायनिक कूड़ा,

यहां तक कि जानवरों व इंसानों की 

लाशें भी उनमें बहाते हैं,


अपनी माताओं की तरह

नदियों की देखरेख

कितने लोग कर पाते हैं?

मां तो मां हम उन्हें नदी न समझ

कूड़ेदान ही मानते जाते हैं,

सच्चाई तो यह है कि नदियों को

मां का दर्जा देना

हममें से ज्यादातर लोगों के लिए

बस मन भरमानें की बातें हैं।


हम स्त्रियों को 'देवी' बुलाते हैं,

फिर शोषण करते हैं उनका

घरों में, कार्यस्थलों में, रास्तों

व हाट-बाजारों में,

यहां तक कि गर्भ में ही उन्हें

मौत की नींद सुलाते हैं,


सचमुच की देवियों की तरह 

उनकी इज्जत, सम्मान और पूजा

कितने लोग कर पाते हैं?

देवी तो देवी हम उन्हें एक इंसान भी

न समझ इस्तेमाल की चीज

समझते जाते हैं,

सच्चाई तो यह है कि स्त्रियों को

देवी का दर्जा देना

हममें से ज्यादातर लोगों के लिए

बस मन भरमानें की बातें हैं।


जितेन्द्र 'कबीर'

चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र - 7018558314