मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है

दिग्भ्रमित हिमालय कांप रहा,

नदियों को मार्ग न सूझ रहा!

व्याकुल धरती चीत्कार करे,

अम्बर बयार संग जूझ रहा!

ऋषि-मुनियों का ज्ञान कहाँ है,

मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है?

विश्वगुरु बन राह दिखाता,

प्रेम और सद्भाव सिखाता!

वसुधा ही परिवार हमारा,

ऐसा अनुपम पाठ पढ़ाता!

नेह दया का गान कहाँ है!

मेरा हिन्दुस्थान कहाँ है?

जिसकी नदियों ने सहर्ष ही,

सबको अमृतपान कराया!

हूण,कुषाण,यहूदी, पहलव,

बिना भेद सबको अपनाया!

पार्थ आज फिर भ्रमित हो रहे,

गीता का वह गान कहाँ है!

मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है?

वेद, कुरान नहीं पढ़ सकते,

किन्तु लड़ेंगे इनकी खातिर,

मातृशक्ति के आँचल को भी,

दूषित करते हैं कुछ शातिर!

जननी और जन्मभूमि का,

आज लुट रहा मान यहाँ है।

मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है? 

मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है।


डॉ0 श्वेता सिंह गौर,वरिष्ठ कवयित्री व 

शिक्षिका,स्वतंत्र लेखिका व स्तम्भकार, 

हरदोई-उत्तर प्रदेश