कैसी मौत ये?

बड़े बुजुर्गों से अक्सर सुना है आप किसी की खुशी में भले शामिल न हो पाओ पर उसके दुःख में ज़रूर शामिल हो। पर ये कोरोना काल क्या आया गैर तो दूर अपनों ने ही पल्ला झाड़ लिया और यूँ इंसानियत ही न जाने कहाँ खो गई। 

कितना दुःखद लगता है एक बुजुर्ग अपनी पत्नी की लाश को साइकिल पर लेकर जा रहा, कोई ठेले पर, कोई अपने कंधो पर,कहीं घर की महिलाएं और बच्चे अर्थी को कंधा दे रहे हैं, कहीं बाप खुद गाड़ी में अपनी बेटी की लाश को लेकर जा रहा है, कहीं कूड़े की गाड़ी में लाश को श्मशान तक ले जाया जा रहा है और कहीं तो पति और बेटा अपनी पत्नी और माँ की लाश को सड़क पर ही छोड़कर भाग गये। 

इस तरह ज़िन्दगी ने तो साथ छोड़ा ही मौत को भी न सम्मान मिला, न रीति रिवाज़ से दाह संस्कार, न ही अस्थि विसर्जन। 

आखिर क्या है ये? क्यों कोरोना ने लोगों के दिल को ही मार दिया? कहाँ लुप्त हो गयी इंसानियत यूँ की मरने पर लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं?

दाह संस्कार केंद्रों में अस्थि कलश के ढेर लगे हुए हैं जिन्हें कोई लेने भी नहीं आ रहा। शास्त्र भी यही कहते हैं न जब तक अस्थियों का विसर्जन न हो मुक्ति नहीं मिलती फिर भी ऐसा चलन जो यकीनन ही शर्मनाक है। 

कहीं तो हालात ये हैं साधनों के अभाव में परिजनों को ज़मीन में यूँ ही गाड़ दिया गया या नदियों के तटों पर छोड़ दिया गया जिस का भयावह सच सबने देखा जब अनेको लाशों तैरती हुई मिली और कुछ जो ज़मीनों में दफन थीं वो उभर आईं सतह से। और सबका फिर सामूहिक दाह संस्कार प्रशासन ने किया।

ये सब देख कर, सोच कर, कल्पना मात्र से भी रूह कांप उठती है की कोरोना से मरने पर इतनी बेकद्री वो ही अपनों के साथ।

जब आंकड़े बढ़े जितनी भीड़ हस्पतालों में हुई बेड की कमी, इंजेक्शन, ऑक्सीजन की कमी के कारण उस से कहीं अधिक श्मशानों में लंबी लंबी कतारें, मनमानी, टोकन सिस्टम, मनचाही रकम एठीं जाने लगी , यही नहीं हस्पताल से लाश उठाने से एम्बुलेंस, या कोई अन्य वाहन सबने दाम बड़ा दिए ये सब बातें यकीनन शर्मिंदा करती हैं कैसे हर किसी ने मौत का मज़ाक ही नहीं उस से मुनाफा कमाने का ज़रिया बना दिया। धिक्कार है ऐसी सोच और कमाई पर जिस की नींव किसी की मौत, लाचारी, आँसूओं पर हो। 

इस तरह इस कोरोना में जहाँ ज़िन्दगी तो हारी ही मौत से उस से ज़्यादा शर्मिंदा हुई कहीं अपनों से तो कहीं हालात से, कहीं लाचारी से और कहीं मुनाफाखोरों से। किस ने कल्पना भी की थी कोई दौर ऐसा भी आएगा जैसा हमने कोरोना काल में देखा जहां ज़िन्दगी से ज़्यादा मौत शर्मिंदा होगी।

न कोई अपने परिजनों को देख सका, न अंतिम दर्शन, न शव यात्रा, न कोई गले लग के रो सका, न कुछ कह सका, न  ही शोक सभा, न प्रार्थना सभा बस गूगल मीट पर ही हुई श्रद्धांजलि अर्पित अपने घरों से। 

जैसे किसी भी शक्तिशाली प्राकृतिक त्रासदी के बाद बर्बादी के मंजर रह जाते हैं उसी तरह इस महामारी के जख्म भी हमेशा कुरेदते रहेंगे हरे रहकर सोच सोच जहां ज़िन्दगी बेबस, हैरान ,परेशान हुई वहीं मौत शर्मसार हुई।


मीनाक्षी सुकुमारन

नोएडा