रहिया जोहत

छोड़िए दऽ बेदर्दी डगरिया हमारी,

रहिया जोहत होइहंऽ बाप-महतारी।

सबेरे हम पढ़े बदे घर से निकरलीं,

जाने केकर मुंह देखीं,यहां फंसि गईलीं।

हम नाहीं जानित काव तोहरा बिगारी,

रहिया जोहत होइहंऽ बाप-महतारी।

तोहरे  बहिन  सम  हमहूं  बहिनियां,

भइया संगें चमकत रहलीं बनके किरिनियां,

उनके पता नाहीं,भेंटइलंऽ व्यभिचारी,

रहिया जोहत होइहंऽ बाप-महतारी।

एतना कुकर्म करके काव  तू पउला ,

माई-बापू के अपने,कोंख लजवउला।

बहिनी के राखी पर पोतला करियारी,

रहिया जोहत होइहंऽ बाप-महतारी।

जिनगी के हमरे माटी में मिलवला,

कुलवा के हमरे अन्हार कै दिहला।

सबके आछत हम  भइली दुखियारी,

रहिया जोहत होइहंऽ बाप-महतारी।

कहां जाईं? कइसे के केहू के बोलाईं,

काहें नाहीं आवत बाटीं,लजिया बचाईं।

कबसे पुकारत हईं,तोहकें मुरारी,

रहिया जोहत होइहंऽ बाप-महतारी।

छोड़ि दऽ बेदर्दी डगरिया हमारी।

अनुपम चतुर्वेदी,सन्त कबीर नगर, उ०प्र०