हे पार्थ!जब जब धर्म घाटता और बढ़ता पाप है।

यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानि:भवति भारत।

अभुत्थानम धर्मस्य 

तदआतमनम सृजअम्याहम

हे पार्थ!जब जब धर्म घाटता और बढ़ता पाप है।

तब तब प्रकट मैं रूप अपना

नित्य करता आप ही।

यही तो कहा था आपने श्री प्रभु,इतना कुछ बीत रहा है भारतवासियों पे , कहा हो आप।पहले आतंकियों के उत्पात ने हजारों की जान ली,फिर कई कुदरती अपदाये आई और कई निरीह जाने गई,और अब ये? क्या है हर आतंक और कुदरती आपदा से बढ़ कर।अर्जुन को खूब समझाया युद्ध करने के लिए, यहां तो सब ही कर्तव्यबद्ध खड़े है।क्या कसूर है उन लोगो का जो सांस लेने से डर रहे है और कैद में बैठे हुए है। दरीद्र नारायण को खाने के लाले है,रिग्नालय भरे पड़े है दर्द के मारो से,जो कुदरत मुफ्त में देती थी वो आज  अधिक ही मूल्यवान  हो रही है,जिसे कहते हैं प्राणवायु उसी की कमी प्राण छूट रहे है।क्या तुम्हारा हृदय करुणा से नहीं भरता ये सब हृदय द्रावक घटनाओं से।क्यों भुल गए हो अपनो को अब तो कुछ लीला करो प्रभू बचालो भारत वर्ष को । अब तो इंतहा हो गई है,अगर इम्तेहान हो गया हो तो कृपा करदो,माना मानवी ने  बहुत अत्याचार किए है तुम्हारी बनाई कुदरत पे ,पर तुम तो दयानिधान हो ,अब तो किरपा करो,तुम्हारे भी द्वार खाली पड़े है, जहां आरती और कीर्तन की आवाज गूंजती थी,शंख और नगाड़े बजते थे वही नाद सुनादो।

हे गिरिधर हरलो अपने भारतवासियों की पीड़ा।

हे गोविन्द सब ठीक करो 

हमे वृंदावन में आना है

जयश्री बिरमी