॥ मंजिल ॥

आगे तेरी मंजिल खड़ी है

पीछे तेरी मुश्किल पड़ी है

सामने खड़ा पहाड़ डराता

पीछे शेर दहाड़ सुनाता

फिर भी तुम झुकना ना जग में

कभी तुम रूकना ना पथ में

चलते जाओ बढ़ते जाओ

मिहनत कर मंजिल को पाओ

थका हारा जो बैठा बेचारा

अवसर से चूक गया किनारा

पीछे मुड़कर कभी ना देखो

आगे बढ़ने की हर वक्त सोचों

पथ कितना भी शूल भरा हो

पत्थर की ठोकर से जुड़ा हो

हिम्मत ना हारो ठोकर को मारो

पथरीली पथ को ना निहारो

चलते जाओ बढ़ते जाओ

नजर सदा मंजिल पे टिकाओ

जग में कोई काम नहीं कठिन है

मंजिल को पाना मुमकिन है

जैसे हर रात की सुबहा होती

असफलता ही सफलता की कुंजी

जो दौड़ा है मंजिल पाया है

हार के बैठा जीवन भर रोया है।


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

9546115088