" उफ न करुंगा मुश्ताक ,,,,,,,


"आंसुओं पर किसी के यकायक 

तुम न भरोसा करना ।

मतलब के लिए आंखों से , 

समन्दर मैं भी बहा सकता हूं । 

वा बस्तगी का राज इस तरह , 

खुल जाएगा अपना ।

सरेराह काली तबस्सुम की , 

मैं भी खिला सकता हूं .,

दिल के टुकड़े मेरे हजार तुमने ,

कर दिए नाहक ,

तस्वीरें अपनी चाहूं तो जमाने , 

को दिखा सकता हूं ,

खून का बदला मुकअम्मिल , 

खून से तो नहीं होता है,

जमीं नीचे से पैरों के उनकी , 

मैं भी हटा सकता हूं ,

जी भर के सतालें वो मुझे ,

उफ न करूंगा मुश्ताक ,

बा वफ़ा हूं मैं दोस्तों नफरत , 

को भी निभा सकता हूं ,

डॉ.मुश्ताक़ अहमद 

शाह, सहज़

हरदा  मध्यप्रदेश,,,,,