'अच्छी औरत '

एक औरत पूरी तरह से हालातों से समायोजन करते-करते लाश बन जाती है तब यह समाज कहता है, यह अच्छी औरत है ।अच्छी औरत होने का अर्थ है ,उसने कभी अपने हिस्से का कुछ मागा ही नहीं ।उसने सिर्फ और सिर्फ त्याग किया उसने यह भी सोचना छोड़ दिया कि वह एक मनुष्य है ।तब उसे अच्छी औरत का टैग मिलता है ।वह जिम्मेदारियों की साड़ी में खुद को लपेटते चली और उसकी इच्छाएं उसकी योग्यताएं उस घुंघट के नीचे दबी रहती है। 

नारी के लिए बड़े-बड़े स्लोगन, बड़ी योजनाएं और कानून बनते हैं लेकिन कभी भी उसे मानव की तरह भी जीने का अधिकार ही नहीं है क्यों??? क्योंकि उसकी इज्जत बड़ी नाजुक सी शीशे की तरह है,.....। इतनी सारी सीमाएं झूठे नियम, झूठे परम्पराओं ने इस तरह से जकड़ लिया है कि वह अपना परिचय भूल चुकी है ।यह आज की बात नहीं यह तब की बात है जबसे सभ्यता का जन्म माना जाता रहा है।अब तो स्थिति ऐसी हो गई है इन परिस्थितियों में खुद को उसने इस तरीके से समायोजित कर लिया है कि वह स्वयं कहां है ??उसे खुद पता नहीं।

लेकिन जब वह जागरूक होती है स्वयं के बारे में सोचती है तो कहीं ना कहीं उसे लगता है कि वह किस रसातल में फंसी है क्या उसके अस्तित्व की सीमाएं यही हैं या इससे इतर भी कोई संसार है ।जहां -

"वह मुक्त बादलों की तरह उड़ सकती,  

नदियों की निरंतर प्रवाह की तरह बह सकती, 

सागर की लहरों की तरह उमड़ कर चांद को छूने के कर्म में लगी रहती, 

पंछी के कलरव की तरह प्रकृति को गुंजायमान करती,

फूलों के स्वच्छंद खुशबू की तरह आप ही महक उठती।"

परंतु ऐसा नहीं है ,क्योंकि वह श्रृंगार करती है जिसमें सिर्फ बंधन है ,जो उसे निरंतर बांधते हैं और वह श्रृंगार में इतनी तल्लीन है कि उसे सुध ही नहीं कि उसने स्वयं को ही बन्धन में रखा है ।

श्रृंगार एक बंधन, जिम्मेदारियां पांव की पायल और वह मुस्कुराते हुए इसे जी रही है। लेकिन कहीं ना कहीं मुस्कुराहट के पीछे आज भी एक क्रंदन है ऐसा क्रंदन जिसकी आंसू बाहर आ भी नहीं पा रहे क्योंकि आंखें पथरा चुकी हैं ।जिसमें हया का काजल लगा हुआ है ,यह भी सोचना है कि कहीं वह काजल बह ना जाए।

परंतु अब सोचना होगा स्वयं के और अस्तित्व के बारे में अस्तित्व का एक टुकड़ा तुम्हारे अंदर से तुमको बुला रहा है ।उठो और उस टुकड़े को फिर अंतरिक्ष तक जाने दो क्योंकि अस्तित्व का अहम हिस्सा नारी तुम ही हो। तुम्हारे अंदर अपार सामर्थ्य अपार ऊर्जा है तुम स्वयं सृष्टि हो। निर्माण तुम्हारे गोद से उठकर अस्तित्व को प्राप्त करता है फिर तुम क्यों विलाप में हो। अपने सम्मान और अपने अस्तित्व को तुम्हें स्वयं बचाना होगा ।

नारी तुमअद्भुत शक्ति हो,

तुम प्रेम रूप तुम सृष्टि हो, 

विश्वास तुम्ही आधार तुम्ही 

प्रलय काल में तुम वृष्टि हो।

 लेखिका- अंजनी द्विवेदी (काव्या) 

नवीन फल मंडी ,अगस्त पार 

देवरिया ,उत्तर प्रदेश