जो तुम्हारी कल्पना से भी परे है

जो तुम्हारी कल्पना से भी परे है,

उतना मेरे प्रेम का विस्तार होगा।

मैं तुम्हारे हाथ की मेहंदी नहीं हूँ,

न तुम्हारे मांग का सिंदूर हूँ मैं,

देख लो किस्मत का कैसा खेल है ये,

अब तुम्हारे नाम से मशहूर हूँ मैं,

क्या कभी तुमने ये सोचा स्वप्न में भी,

गीत मेरा तेरे रूप का श्रृंगार होगा।

जो तुम्हारी कल्पना से भी परे है,

उतना मेरे प्रेम का विस्तार होगा।

जो भी मेरी कल्पना है तुमको लेकर,

अपने शब्दों में उसे उभारता हूँ।

मुझको पढ़ने वाले भी ये जानते हैं,

कागजों पर मैं तुम्हें उतारता हूँ,

देखना एक दिन मेरे एक गीत पर,

नाम तेरा ले रहा संसार होगा।

जो तुम्हारी कल्पना से भी परे है,

उतना मेरे प्रेम का विस्तार होगा।

छंद और दोहे तेरी पायल पर लिखकर,

एक कविता तेरी कुमकुम पर लिखूंगा,

और अगर शब्दों का अंतिम दिन भी आये,

तो भी अंतिम शब्द में तुम पर लिखूंगा,

मेरी तरह बीत जाएंगे तुम ही पर,

मेरे शब्दों को भी ये स्वीकार होगा।

जो तुम्हारी कल्पना से भी परे है,

उतना मेरे प्रेम का विस्तार होगा।

एक तुम्हारी वो पुरानी तस्वीर लेकर,

बात करता हूँ मैं तुमसे मन ही मन में,

मेरे हृदय में सदा तुम ही रहोगी।

बात ये मैंने थी बोली तुमसे वचन में,

जो तुम्हारी कल्पना से भी परे है,

उतना मेरे प्रेम का विस्तार होगा।


डिम्पल राकेश तिवारी

अवध यूनिवर्सिटी चौराहा

अयोध्या-उत्तर प्रदेश