व्याकुल विधवा

सौभाग्य का दर्पण टूट गया , 

टुकड़ों को आकर उठाओ ना! 

प्रियतम मेरे मौन कुटीर में,

अनंत लोक से आओ ना!!

मैं चंचल बहती सरिता सी

 लहरें मेरी ठहर गई हैं !

वो मेरे जीवन के ध्रुव तारा,

तुम्हारे स्मृति भी उतर गई है!

चुप लगी अधरों पर मेरे 

प्रेम सुधा बरसाओ ना! 

प्रियतम मेरे मौन कुटीर में

अनंत लोक से आओ ना!

उन्मुक्त अमर स्वप्न नैनन में

तुम बिन भला क्या जीवन में! 

विकल हृदय भीगी आंखें 

मन के मधुकर सहमें मन में 

ना आए नजर दुनिया को 

दुनिया के नजरों से बचाओ ना! 

 प्रियतम मेरे मौन कुटीर में 

अनंत लोक से आओ ना!!

तूफान है, पर कोई शोर नहीं

 इस पीड़ा का कोई छोर नहीं !

हे मन मंदिर के देव प्रतिमा 

बन जाओ ऐसे कठोर नहीं !

अश्रु जल से जल रहा प्राण ये

 तुम दीपशिखा बन जाओ ना!!

 प्रियतम मेरे मौन कुटीर में 

अनंत लोक से आओ ना!


रजनी उपाध्याय, वरिष्ठ गीतकार

कवयित्री व स्वतंत्र लेखिका,

सान्तिनगर,अनूपपुर,मध्य प्रदेश

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