बड़ा मानूस

इतनी बड़ी गाड़ी में  सरपट चली जा रही थी उस से भी ज्यादा तेज उनका दिमाग दौड़ रहा था।अपनी कंपनी के लिए ओर्डर लाना,उसको सप्लाई करना और कौन से कौन खयाल आते जाते थे और जाते थे।

      और कब दिमाग पुरानी बातों की ओर चला गया उसका पता ही न चला।छोटा सा गांव घर में बहुत सारा पशुधन, बाबा की किसानी जिंदगी,सुबह सवेरे उठ खेतो में जाना ,उनको खाना पहुंचना मां के साथ जाना, मां तो चलती थी  पर वो तो कुदरत की गोद में दौड़ने ने का आनंद ही और था ।फिर एकाएक आपदा आई सुखा पड़ा सब बर्बाद हो गया बहुत कोशिशों के बाद भी कुछ न हो पाने से बाबा की तबियत का खराब होना और उनका चल बसाना।मां का पापा के गम में आपा भूल जाना,घर और खेतो का लाले द्वारा कर्जे के बहाने से हथिया लेना ,सब कितना कष्टदायक था!

        मां का जिम्मा चाचा और चाची के जिम्मे छोड़ १६ साल की उमर में मुंबई भाग आना सब जैसे कल की बात थी।शहर में रहना है तो शहर को समझना बहुत जरूरी था।न घर न छत चिपटी के पास फुटपाथ पे सोना और रेडी में से कुछ न कुछ खा के पेट भरना और छोटा मोटा जो काम मिले वो कर पेट भरता था।वही चौपाटी पे एक भेलपुरी वाला था जिसका स्वाद अभी तक उनके मुंह में था।

अब जब मेहनत रंग लाई थी करोड़ों का व्यवसाय था ,घर बीबी बच्चे ,मां सब बहुत खुश थे ।व्यवसायिक जगत में मान सम्मान था,बड़े बड़े नेता लोगो से अच्छे ताल्लुकात थे।

   इतना कुछ मिलने के बाद बड़े मानूस तो बन गए पर वो मुंबई के शुरुआती दिन दिमाग से नही निकलता था।

      चलती गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा तो चौपाटी के पास से गुजर रहे थे।एक दम गाड़ी रुकवाई ,अपना किमती कोट निकाल सीट पर रखा और गाड़ी से उतर वहीं भेलवाले के पास पहुंचे ,थोड़ा वृद्ध लग रहा था वह पर पहचान में आ गया,उसने शायद नहीं पहचाना।एकभेल बनवाई और बैठने की जगह ढूंढ ने लगे दूर एक बड़ा सा पत्थर था वहा जा के बैठे और लिफाफा खोलने लगे कि  किसी की आवाज आई कैसे है सर! हाथ पीछे कर लिफाफा छुपा दिया,सिर हिला के अभिवादन कर वह चला गया,फिर लिफाफा खोल खाने की सोची फिर कोई आया और ये प्रख्यात होने की कीमत अदा कर रहे थे।ये सिलसिला काफी देर चला और हार के लिफाफा पीछे की और सरकाके फेक उठ खड़े हो सरपट गाड़ी की और चले और बोले घर चलो।

जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद