“जो रास्ता खुशी दे”

लिव-इन- रिलेशन में रहना आज कानूनन वैध हो गया है और एक समाज विशेष के लिए स्वीकार्य भी। कुदरत ने बच्चे पैदा करने की जिम्मेदारी स्त्री के शरीर को दी है। लेकिन जब लिव इन रिलेशनशिप की व्यवस्था को एक लड़की स्वीकार करती है तो पुरुष की ही तरह क्या वह इसके परिणाम के लिए मानसिक रूप से तैयार रह पाती है? ' सिंगल मदर'आज के आधुनिक जीवन का एक जीता जागता सच है। 

“शायद अब हमें साथ नहीं रहना चाहिए” कहता हुआ केशव तौलिया उठाकर बाथरूम में घुस गया. 

“लेकिन...?”  केशव की बात पर भौंचक्की सी वह कुछ कहना चाहती थी पर तब तक दरवाजा भड़ाक से बंद हो चुका था और तेज शावर चलने की आवाज़ आने लगी थी.

एकाएक राशि को तेज चक्कर आने की सी अनुभूति हुई, वह मेज का सहारा लेकर बिस्तर पर बैठ गई. वे दोनों पिछले 5 साल से लिव-इन-रिलेशन में रह रहे थे. इतने लंबे समय तक साथ रहतेरहते अब वह केशव से शादी के बारे में सोचने लगी थी. आदिकाल से वैवाहिक बंधन पुरुषों की फितरत को तो कभी भी नहीं बांध पाया था, पर अब तो सारे बंधन तोड़कर,  नईनई मिली आजा़दी का जश्न मनाती स्त्री भी पुरुषों के जीवन के इस मापदण्ड के समीकरण का हिस्सा हुई जा रही थी.

राशि भी बहुत खुशी से इस आजा़दी का जश्न मनाकर, सभी तथाकथित पारंपरिक मान्यताओं को तोड़,  माता-पिता की सलाह को दरकिनार कर,  नाते रिश्तेदारों व समाज की परवाह न कर, अपनी आर्थिक आजा़दी को, अपनी शारीरिक व वैचारिक आजा़दी में पिछले 5 साल से तबदील करने के लिये कटिबद्व थी. 

लेकिन फिर क्या हुआ?  पिछले कुछ समय से वह इस आजा़दी से थकने क्यों लगी है? बिन बंधन की आजा़दी मोह क्यों नहीं रही है?  क्यों कोई उलझन उसके इतने सालों से निर्बाध चलते कदमों को अब ठिठकने के लिये मजबूर करने लगी है?

      पिछले 5 साल में वह 2 बार अबॉर्शन करवा चुकी थी, लेकिन अब तीसरी बार न जाने क्यों वह, यह बात केशव से छिपा गई. जब चौथा महीना शुरू हो गया तो केशव को भी उसके शरीर में आए परिवर्तन का अहसास होने लगा.

“क्या कुछ ऐसा है, जो तुमने मुझे नहीं बताया..?”  एकदिन केशव पूछ बैठा. जवाब में वह चुप हो गई.

“लेकिन क्यों....?  क्यों किया तुमने ऐसा राशी..कैसे पालोगी इस बच्चे को अकेले...?”  केशव अकस्मात गुस्से में चिल्ला पड़ा.

“अकेले क्यों...,  हम दोनों का है तो हम दोनों ही पालेंगे”

“हम लिव-इन-रिलेशन में रह रहे हैं....और मेरी समझ से तुम्हें इसका मतलब समझाने की जरूरत नहीं..”  केशव भन्नाकर बोला.

“हम 5 साल से साथ रह रहे हैं...अब हमें शादी कर लेनी चाहिए केशव...” वह फिर भी शांत रही.

“पर मुझे शादी नहीं करनी है...लिव-इन-रिलेशन में रहना शुरू करने से पहले ऐसी कोई शर्त तो नहीं थी न हमारे बीच...?”  केशव ने उन दोनों के रिश्ते को पलभर में ही वास्तवकिता के कठोर धरातल पर पटक दिया.

“लेकिन केशव,  जो बच्चा हमारे बीच आ रहा है...वह है तो हमारा ही...” केशव की तीब्रता देख,  वह भरकश अपने स्वर को अतिशय कोमल बनाकर बोली.

“मुझे इस बच्चे से कोई लेना देना नहीं....यह तुम्हारा डिसीजन है...मेरे लिए यह सिर्फ भावुकता व उत्तेजनावश की गई,  कुछ कमज़ोर क्षणों का नतीजा है बस” तटस्थ व कठोर स्वर में अपनी बात कह,  केशव मुँह फेरकर सो गया.

और वह निशब्द हल्की रोशनी में कमरे में नज़र आ रहे सायों पर नज़रें गड़ाये, अपनी भूत में की गई गलतियों के सायों से गडमड होती भविष्य की तस्वीर से भयभीत हुई बैठी रह गई.

“अब..?  क्या है जीवन,  इसके आगे..कानूनन उसका कोई अधिकार नहीं है केशव पर और अगर इस बच्चे का अधिकार हो भी तो क्या इतना सरल है साबित करना...इसमें उसकी सामाजिक,  आर्थिक,  मानसिक,  शारीरिक स्थिति कितनी चरमरा जाएगी. यह वह अच्छी तरह से जानती थी

पिछले कुछ समय से उन दोनों के बीच आने वाला बच्चा भयंकर टकराव का कारण बन चुका था और आज उसकी परिणति केशव के इस एक वाक्य में कहे फैसले ने कर दी थी कि “शायद अब हमें साथ नहीं रहना चाहिए”

लिव-इन-रिलेशन के रिश्ते का यह परिणाम हो सकता है, यह सच है पर कितना भयानक है...इसके लिए वह खुद को मानसिक रूप से तैयार करने लगी. अपनी शक्ति को केशव से लड़ने में खर्च करने के बजाय वह आगामी भविष्य पर अकस्मात लिख दी गई कठिन इबारत को पढ़ने का मादा अपने अंदर संजोने की पुरजोर कोशिश कर रही थी.

वह बहुत देर तक सोचती रही. कुछ फैसले लिए. कुछ फोन किए और फिर दूसरे कमरे में जाकर सो गई. सुबह का नाश्ता केशव बनाता था. डिनर की तैयारी राशि करती थी.

सुबह केशव किचन में व्यस्त था कि राशि अपनी अटैची व बैग लेकर,  दूसरे कमरे से तैयार होकर बाहर निकली. मेज पर नाश्ता रखते केशव के चेहरे पर कई प्रश्न एक साथ लक्षित हो गए.

“तुम सही कहते हो केशव,  शायद अब हमें साथ नहीं रहना चाहिए....” केशव के चेहरे पर टंगे प्रश्नों को दरकिनार कर राशि बिना किसी लाग लपेट के बोली.

“लेकिन....लेकिन....मेरा मतलब...?”  अपनी उम्मीद के विपरीत राशि का रुख देखकर केशव चैंक गया.

“मैं अपनी बचपन की दोस्त सलीना के साथ शिफ्ट हो रही हूँ”

“मतलब कि तुम्हें शिफ्ट होना मंजूर है पर अबॉर्शन करवाना नहीं”  केशव विद्रुप स्वर में बोला.

“मुझे अबॉर्शन करवाना है या नहीं,  यह फैसला तुम नहीं मैं करूंगी केशव...हम दोनों लिव-इन में रहे...यह दोनों का फैसला था...प्रकृति ने बच्चे पैदा करने की पूरी ज़िम्मेदारी स्त्री के शरीर को दी है...जबकि इस स्थिति को उत्पन्न करने के लिए दोनों बराबर के जिम्मेदार होते हैं...तुम्हारे लिए यह कुछ कमजोर क्षणों की भूल भर है....पर मैं पूछना चाहती हूँ केशव कि क्या तुम भी किन्हीं कमजोर क्षणों की भूल का नतीजा हो...? और अगर नहीं तो यह बच्चा हम दोनों के प्यार की निशानी क्यों नहीं है....मुझे चौथा महीना पूरा होने वाला है, अब या तो मैं अपनी जान पर खेलकर इस बच्चे को खत्म कर दूँ या अपनी आन पर खेलकर इसे जन्म दूँ....यह मेरी मर्जी है...” राशि शांत मगर दृढ स्वर में बोली.

“एक पुरुष कुंवारा बाप बनने में शर्म महसूस नहीं करता तो एक स्त्री क्यों?...लिव-इन में रहना आज कानूनन व एक वर्ग विशेष के लिये मान्य हो गया है....तो इसके स्वभाविक परिणामों के लिए एक स्त्री ही क्यों मुँह छिपाती फिरे...”  कहकर राशि बैग कंधे पर डाल,  अटैची ड्रैग करती हुई बाहर निकल गई.

टैक्सी में बैठी राशि का दिल व आँखें,  आँसुओं से सराबोर थीं. इतना बड़ा फैसला लेना सरल नहीं था. थोड़ी देर बाद वह सलीना के फ्लैट की घंटी बजा रही थी. सलीना को देखते ही अपनेपन की ऊष्मा से,  पिछले कुछ दिनों से उसके अंदर जमी हुई बर्फ पिघल कर बाढ़ की तरह तूफान मचाती हुई बहने लगी. सलीना बहुत देर तक उसे गले लगाए, पीठ सहलाती हुई आश्वासन देती रही.

“बस राशि,  आज रो ले...आज के बाद एक भी आँसू नहीं...जब लिव-इन-रिलेशन की व्यवस्था को स्वीकार करने की हिम्मत एक लड़की करती है  तो पुरुष की ही तरह परिणाम के लिए उसे भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए...हालांकि माँ बनना ही स्त्री के जीवन की वह कमजोर कडी़ है या कहना चाहिए वह फटा हिस्सा है,  जहाँ पुरुष अपना पैर डालकर,  खुद स्वछंन्द हो फिर से गुंजायमान भंवरा बन जाता है...केशव भी किसी न किसी दिन शादी कर ही लेगा...भले ही जीवन में आने वाली उसकी वह लाइफ पार्टनर, इससे पहले किसी की लिव-इन-पार्टनर बन चुकी हो....पर जिस लड़की के साथ 5 साल रहा...जब उसके साथ ज़िंदगी बिताने की बात नहीं सोच पाया तो किसी नये के साथ, जो अपने स्याह अतीत की दुविधा को भी साथ लेकर आएगी...कैसे निभा पाएगा...?”.

“तू बैठ,  मैं कॉफी बनाकर लाती हूँ...” सलीना जाकर 2 कप कॉफी बनाकर ले आई.

“अब बता,  क्या करना चाहती है....केशव से इस बच्चे का अधिकार पाने के लिए, कानून की किताबों को खंगालना या अकेली माँ बनकर एक नई राह तलाशना....कौन सा रास्ता खुशी दे देगा,  यह भविष्य की बात है पर इतना जानती हूँ कि किसी इन्सान से लड़ने से अच्छा है परिस्थितियों के खिलाफ लड़ना....कम से कम जीत गई तो तुझे सुकून देगी...इन्सान से जीत कर भी सुकून नहीं मिलेगा”

“तू ठीक कहती है सलीना...मैं उस बात के लिये कमजो़र क्यों बनूं,  क्यों रोऊँ, गिड़गिड़ाऊँ...जिसका कारण सिर्फ मैं अकेली नहीं हूँ...अपनी ताकत,  अपनी हिम्मत,  अपना पैसा,  उस उबड़ खाबड़,  बियाबान रास्ते पर चलने में क्यों झोंकू,  जिसका अगर कोई हल निकलेगा भी तो तब तक मेरे जीवन का सारा रस सूख चुका होगा”

“शाबाश...यह हुई न बात...अब तू वही पुरानी राशि लग रही है,  जो परिस्थितियां कैसी भी हों,  उनका गुलाम नहीं....बल्कि परिस्थितियों को अपना गुलाम बनाने की तरफ ही सोचती थी....और फिर थोड़ी सी परिस्थितियों का ही तो फर्क है राशि...मैं शादीशुदा हूँ...पर बेटा हॉस्टल में...पति 3 साल से यू. एस. गए हैं...मैं भी तो अकेले ही यहाँ ज़िंदगी से जूझ रही हूँ..”

“परिस्थितियों से निबटना व सामाजिक व्यवस्था और उसके बनाए दायरे से बाहर जाकर परिस्थितियों से निबटने में बहुत फर्क है सलीना...”  बोलते बोलते राशि की आँखों में 2 मोती आकर फिर अटक गए.

“जानती हूँ...पर एक दरवाजा बंद होता है तो कई नये दरवाजे भी खुलते हैं...बस खोलने की हिम्मत होनी चाहिए...चल अब कुछ खाले  और ऑफिस जा...छुट्टी करने की कोई जरूरत नहीं...खुद को कमजो़र होने का मौका बिल्कुल नहीं देना है..”

थोड़ी देर बाद दोनों ऑफिस के लिए निकल गई. उसका आने वाला बच्चा अब उसके शरीर से टकराती नज़रों में सवाल बनकर उभरने लगा था. लेकिन उसने कुछ छिपाया नहीं. कई बातें छिपाने पर तनाव से गुजरना पड़ता है. इससे अच्छा है, एक बार सच बोलकर खुद को शांत रखना. झूठ हर बार अपना  बहाव,  तेजी,  फितरत,  आदत,  आकार प्रकार व भाव बदल देता है. लेकिन सच हमेशा सच ही रहता है. राशि ने भी एक बार सबको सच बताकर सबका मुँह बंद कर दिया था. 

बच्ची का जन्म हो गया. राशि के घर में पता चला पर कोई उसे देखने भी नहीं आया. सलीना ने औपचारिकता निभाते हुए केशव को भी सूचना दी पर उसने भी पूरी तरह से बेरुखी दिखा दी. आरवी एक साल की हो गई थी. सलीना की ज़िद्द पर उसने ऑफिस कर्मियों व कुछ निजी दोस्तों को एक छोटी सी पार्टी दे डाली थी. सलीना रात को कमरे में आई तो राशि एक हाथ से आरवी को सहलाती हुई,  चुपचाप आँखों में उमड़ आए  आँसुओं को पोंछ रही थी.

“अरे,  यह आज फिर बिन बादल बरसात कैसे..क्या हुआ?”

“कुछ नहीं...” आँसू पोंछकर राशि ने जबरदस्ती मुस्कुराने का प्रयत्न किया.

“कुछ तो है....मुझसे कुछ छिपाने की जरूरत क्यो आन पड़ी..” सलीना सजींदा हो गई.

“नहीं तुझसे कुछ नहीं छिपा सकती..”  राशि फिर पिघलने लगी,  “वह शादी कर रहा है” भर्राये कंठ से वह बोली.

“कौन...केशव?”

“हूँ..”

“तेरा मन अभी भी उसके इर्द गिर्द घूम रहा है?”

“कैसे न घूमेगा सलीना....कहाँ छुटकारा पाऊँगी...”  वह नन्हीं आरवी की तरफ एकटक देखते हुए बोली,  “इस डोर से तो बंधी ही हूँ न...”  एक वृत्त तो था,  आरवी के रूप में जिसने दोनों को अपने घेरे में ले रखा था.

“सलीना,  शादी कितना बड़ा बंधन लगता है न हमें...जब तक उस खूबसूरत बंधन में बंधने,  निभने व बुनियाद बनाने की उम्र होती है....और हम आजा़दी को चुन लेते हैं...लेकिन फिर यह बिन बंधन की आजा़दी का मोह खत्म क्यों होने लगता है...विवाह एक बंधन ही सही  पर उस बंधन की आजा़दी का मोह आखिर इतना आकर्षित क्यों करने लगता है....कि एक उम्र के बाद उसमें बंधने के लिए हर स्त्री पुरुष छटपटाने लगता है....कहाँ पर गलती होती है?....कौन सी व्यवस्था सही है...?”  राशि की आँखें फिर बदरी बन बरसने लगीं.

“ये सब सोचकर खुद को कोसने के बजाय...एकजुट होकर भविष्य की तरफ देख...अब तू सिर्फ एक लड़की नहीं...माँ भी है आरवी की...एक ‘सिंगल मदर‘  जो आज के आधुनिक जीवन का एक जीता जागता सच है....इसलिए अकेली माँ के इस सच को स्वीकार कर...जीवन को नये सिरे से संवारने व नये ढर्रे पर ढालने के लिए खुद को तैयार कर राशि...”

“दूसरा मैं तुझे बताना चाहती थी कि एक महीने बाद विनय भी वापस आ रहे हैं...”

सलीना का इतना कहना काफी था. “ठीक है सलीना,  मैं जल्दी ही अपने लिए कोई व्यवस्था कर लूंगी..”

एक महीने बाद राशि एक स्टूडियो अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गई. अतीत को पूरी तरह बिसरा कर,   वह पूरी तरह से अब वर्तमान में जीकर भविष्य की तरफ देख रही थी. लिव-इन-रिलेशन में रहने के बाद अलग होने की स्थिति में सिंगल मदर होना कोई गुनाह नहीं है और न किसी को अपमानित करने या कमतर समझने का हक है उसे...खुद का सम्मान करना सीखेगी तो कोई भी उसका अपमान करने की हिम्मत नहीं कर सकता. यही सोचकर वह उमंगो व विश्वास के उड़ते छोरों को मजबूती से पकड़ जीवन डगर पर फिर से बढ़ चली थी. 

लेकिन ऑफिस में बमुश्किल साल भर पहले आया आर्यन,  अक्सर उसकी खींची लक्ष्मण रेखा को पार करने की धृष्टता जब तब कर बैठता. सावंली रंगत,  मध्यम कद काठी,  साधारण सी शख्सियत व साधारण से परिवार से संबध रखने वाले,  सरफिरे आर्यन से,  वह जितना दूर जाना चाहती,  वह उतना ही उसे घेरता रहता. अभी नयानया ही तो बांधा था राशि ने खुद को. उसके अरमानों पर बंधी ढीली सी गिरह को कोई जरा सा सहारे की उंगली से आराम से खोल सकता था. 

“हर वक्त खुद के बनाए मकड़जाल में क्यों उलझी रहती हो...”  एक दिन धृष्ट हो आर्यन सवाल दाग बैठा. 

“मकड़ी को शायद अच्छा लगता है,  अपने खुद के बनाए जाल में उलझे रहना...क्यों तुम्हें कोई एतराज है?” वह चिढ़ कर बोली.

“एतराज यह है कि यदि मैं उस जाल के अंदर आने की कोशिश करूंगा तो डर है कि कहीं जान न गंवा बैठूं...इसलिए उम्मीद करता हूँ कि मकड़ी ही उस जाल से बाहर आने की हिम्मत कर बैठे..”

“न तुम यह गुस्ताखी करो और न मकड़ी का ही कोई अरमान है बाहर आने का..” वह त्यौरियां चढ़ाते हुए बोली.

“पर मैं फिर भी इंतजा़र करूंगा तुम्हारे बाहर आने का...क्यों खुद को सजा दे रही हो”  बेबाक सा आर्यन आज एकाएक सजींदा हो गया.

राशि उसकी संजींदगी से आँखें,  कान बचाती हुई घर चली आई पर आर्यन की बातें देर तक कानों में गूंजती रही. आरवी तीन साल की होने वाली थी. केशव का फ्लैट छोड़ने के बाद उसकी केशव से मुलाकात नहीं हुई थी. अभी तक उसने खुद को सचमुच अपने जाल में जकड़ रखा था। इसलिए आर्यन की बचकानी बातों को एक कान से सुनकर वह दूसरे कान से निकाल देती थी पर पता नहीं आज उसके सजींदा स्वर में कैसी कसक थी कि भुलाये न भूल रही थी. आर्यन का भरा हुआ सा स्वर निरंतर उसके कानों में गूंज कर प्रतिघ्वनित हो रहा था. विचलित सी वह कुछ समझ नहीं पा रही थी. यों आर्यन के लिए  उसके दिल में किसी तरह की भी कोमल भावनाएं कभी पैदा नहीं हुईं थीं लेकिन आज उसे समझने का नज़रिया कुछ बदल जरूर रहा था.

अपने ही खयालों में उलझी हुई सी वह बिना कुछ खाये पिये बिस्तर पर लेट गई. तभी मोबाइल की घंटी बज गई. उसने फोन उठाकर देखा,  इतने समय बाद स्क्रीन पर केशव का नाम देख मानो शरीर का समस्त द्रव जम गया. सैकड़ों सवाल मस्तिष्क में कौंध गये. दुविधा में पड़ी वह फोन भी रिसीव नहीं कर पाई. लेकिन फोन एक बार बंद होकर फिर बजने लगा. अनेकों सशंय मन में लिए उसने न चाहते हुए भी यंत्रवत फोन उठा लिया.

“कैसी हो राशि....?” उससे कोई जवाब न दिया गया. लंबे समय बाद केशव की आवाज की ऊष्मा से वह जैसे मोमबत्ती की तरह पिघलने लगी थी. कोई जवाब न पाकर केशव खुद ही बोलने लगा,  उसकी आवाज़ गमगीन थी,  “तुम्हारे बिना रहना मुश्किल होता जा रहा है राशि...तुम्हारी ज़िद से ज़िद में आकर मैंने रास्ता बदल तो लिया,  लेकिन सिमी के साथ एक दिन भी खुश नहीं रह पा रहा हूँ...हर समय तुम न जाने कैसे बीच में आ जाती हो...सिमी और मैं अलग हो रहे हैं....मैं अपनी बेटी और तुम्हारे पास वापस आना चाहता हूँ,  मुझे माफ कर दो..”

राशि की समस्त इंद्रियां श्रवण तंत्र बन गई. सांसें मानो अपना प्रवाह विस्मृत करने लगीं. शरीर में कोई स्पंदन शेष न था. वह पाषण बन बुत की तरह मोबाइल कान से लगाकर अविचल बैठी थी. बहुत कुछ कहना चाह रही थी पर स्वर जैसे निष्ठुर बन रूठ गए थे. 

“मैं जानता हूँ राशि...तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो पर बस मुझे एक मौका दे दो...कभी शिकायत न होगी तुम्हें मुझसे...आरवी अभी बहुत छोटी है...उसे पिता के साये की जरूरत है...अपने लिए न सही,  आरवी के लिये स्वीकार कर लो मुझे...अब कभी तुम्हें अपनी ज़िन्दगी से जाने न दूंगा...मना लूंगा तुम्हें...” केशव की आवाज भावनाओं के वेग से नम हो कांप रही थी. 

राशि की जबान तो तालू से चिपक गई थी. उसने कोई जवाब नहीं दिया. “आज सोच लो अच्छी तरह से...मैं कल दोपहर 1 बजे तुम्हें फोन करूंगा... “ कुछ जवाब न पाकर,  अपनी बात कह केशव ने फोन रख दिया.

फोन ऑफ कर राशि निढाल हो बिस्तर पर गिर गई. बहुत कुछ याद आ गया. वह दिन,  जब उसने केशव का फ्लैट छोड़ा था. कितनी निराश्रित होकर घर से निकली थी. अपने बिन बाप के बच्चे को इस धरती पर लाने के लिए उसे भी धरती जितना धैर्य रखना पड़ा था. केशव ने पलटकर भी न पूछा था कि वह किस हाल में है. अपनी बच्ची के पैदा होने की खबर सुनकर उसके दिल में उसे एक बार देखने की तमन्ना तक न जागी थी,  और आज?

लेकिन कितना मनभावन व संपूर्ण था यह प्रस्ताव...सच तो यह है कि केशव के बाद किसी पुरुष के नजदीक जाने की चाह ने उसके ह्रदय में कभी जन्म ही न लिया. सब कुछ बिखर गया था, एक विश्वास तो था ही,  चाहे लिव-इन में रह रहे थे. दिल दिमाग में छाया तो केशव ही रहा था....वह पुरुष नहीं थी कि सब कुछ भुलाकर फिर अपना नया आशियां बना लेती...और इतना सरल भी नहीं था आरवी की ज़िम्मेदारियों के साथ....आज अगर वह केशव का प्रस्ताव मान ले तो कितनी ही अनसुलझी बातें सुलझ जाएंगी. आरवी को अपने जन्म की जटिल विभीषिका पता भी नहीं चलेगी. उसे अपने पिता का प्यार मिल जाएगा.  उसे केशव का साथ वापस मिल जाएगा जिससे उसका सामाजिक,  मानसिक, पारीवारिक जीवन स्थिरता पा लेगा. लेकिन..”

वह विचारों व भावनाओं के अarZ}an की कशमकश से उठ कर पीछे तकिया लगाकर बैठ गई,  “लेकिन क्या जवाब देगी अपने अंदर की राशि को...उस स्त्री को जिसे कोख में दोनों की गलती कहें या प्यार का फल अकेले लेकर घर से निकलना पड़ा था. वह शारीरिक बलात्कार भले ही न हो, लेकिन क्या जवाब है उस मानसिक बलात्कार का केशव के पास....जिसका फल स्वाभाविक व कुदरती होकर भी सिर्फ उसे ही भुगतना पड़ा था...केशव उसकी जिद के कारण ज़िद में आया तो उसने रास्ता बदल दिया...उसके व अपनी बेटी के पास वापस आने का मन किया तो पत्नी से नहीं बनी...आखिर कौन सा स्वर्ग पाने की खुशी में रास्ता बदल गया था केशव...तब बेटी के प्रति कोई मोह न जागा...दोनों के कर्मों की सजा उसने अकेले भुगती, पारीवारिक, सामाजिक और मानसिक तौर पर भी. खुद को तैयार भी कर लिया था अब भविष्य में आरवी के सवालों के जवाब देने के लिए. इन सबके बीच केशव कहाँ था?”

वह बहुत देर हल्के अंधेरे में बैठी विचारों के सागर में गोते लगाती रही. उसकी तंद्रा तब भंग हुई जब अलार्म घड़ी ने बजकर सुबह होने की सूचना दी. चौंक कर उसने घड़ी की तरफ देखा,  सुबह हो गई...पता भी न चला. उसने आरवी को उठाकर स्कूल के लिए  तैयार किया. उसे छोड़ कर आई. आज ऑफिस जाने का मन नहीं था. इसलिए छुट्टी के लिए मेल कर दिया. 

चाय लेकर बैठी तो अपनी कशमकश में उलझी उसकी आँखों में आँसू छलक आए. आँसू तो उस दिन भी छलके थे जिस दिन वह बेसहारा होकर अंधेरे,  अनजान भविष्य की तरफ कदम बढ़ा रही थी. लेकिन आज के आँसू मान,  स्वाभिमान व आत्मविश्वास के थे. आज केशव व आर्यन दो-दो मजबूत सहारे उसकी तरफ अपने हाथ बढ़ा रहे थे. उसका साथ पाने को आतुर थे. उसके मन मस्तिष्क में एक निर्णय धीरेधीरे पुख्ता हो रहा था. शायद अगले कुछ घंटों में वह किसी नतीजे पर पहुँच पाएगी. ऐसा सोचकर उसने खुद को संतुष्ट किया और घर के कार्यों में लग गई.

ऑफिस का टाइम शुरू हुए काफी देर हो गई थी. आर्यन ऑफिस पहुँच गया होगा. उसे उसकी छुट्टी का पता भी चल गया होगा. तभी फोन की घंटी बज गई. उम्मीद के अनुसार आर्यन का ही फोन था. उसने फोन नहीं उठाया. थोड़ी देर बाद फोन फिर बजने लगा. वह फोन को बस घूरती ही रही. फोन थोड़ीथोड़ी देर में बजकर फिर बंद हो जाता. उसके बाद काफी देर तक फोन नहीं बजा लेकिन घर की घंटी बज गई. उसने दरवाजा खोल दिया.

चिन्तित सा आर्यन दरवाजे पर खड़ा था,  “क्या हुआ तुम्हें...कब से फोन मिला रहा हूँ...तुमने बीमारी का मेल किया था...इसलिए मैं चिन्तित हो गया था...सोचा शायद तुम्हें मेरी मदद की जरूरत होगी...पर तुम तो एकदम ठीक लग रही हो...”  वह गुलाबी सूट में सजी संवरी राशि को देखकर आश्चर्य से बोला.

“तुम्हारा फोन उठा लेती तो तुम्हें मेरी कितनी फिक्र है यह कैसे जान पाती...? ” वह मुस्कराती हुई वापस पलट गई.

“तुम्हें हँसी सूझ रही है...मेरी तो जान ही सूख गई थी...कि आखिर हुआ क्या है जो इतनी देर से मोबाइल नहीं उठा रही हो..”  केशव की चितां उसे ठीक देखकर अब गुस्से में तब्दील हो गई थी,  “ऐसा कहीं होता है?”

“तो फिर कैसे होता है...?”  राशि मंदमंद मुस्कराती चाय बनाने लगी.

“तुम्हें जरा भी फिक्र है कि मैं किस तरह से भीड़ से हाथापाई करता आ रहा हूँ..”

“तो मत करो न हाथापाई...मुझे अपने घर ले चलो...” राशि की मुस्कुराती आँखें एकाएक नम हो गईं,  “ये लो गरम गरम चाय पियो”

“राशि...?  तुम्हें पता है न तुम क्या बोल रही हो...”  हतप्रभ सा आर्यन चाय का कप वापस स्लैब पर रखता हुवा बोला.

“हाँ आर्यन,  मकड़ी अपने बुने जाल से बाहर आना चाहती है...क्या तुम सहारा दोगे...?  “ राशी की पलके भीग गई. बहुत बड़ा निर्णय ले रही थी. बहुत कुछ छूट रहा था.

“सहारा नहीं....सहारा तो कमजोरों को दिया जाता है राशि...तुम तो मजबूत हो. बस थोड़ा सा बिखर गई हो...समेट लूंगा तुम्हें...” वह भाव विव्हल स्वर में बोला.

“तो समेट लो न...इससे पहले कि कुछ और बिखर जाँऊ....”  राशि ने अपना सिर आर्यन के कंधे पर रख दिया. आर्यन ने परम संतुष्टि,  विश्वास व खुशी से राशि को दोनों बाँहों में समेट लिया. दोनों की धड़कनें एक हो रहीं थी. घड़ी में 1 बज रहा था और मोबाइल बजबज कर तूफान खड़ा कर रहा था. आखिर तूफान शांत हो गया. शायद केशव को भी इस तूफान के बाद के सन्नाटे के कारण का अहसास हो गया था. जवाब मिल गया था उसे.

  लेखिका-सुधा जुगरान