॥ पर्यावरण ॥

प्रकृति की दुश्मन बन गया है मानव

प्रकृति संग छेड़ छाड़ कर बन बैठा दानव

कहीं पहाड़ को बारूद से उड़ाता है

बाँध बना नदी की बहाव रोक लेता है


कहीं वृक्ष कटता दिन रात

पर्यावरण से करता है घात

प्राण वायु का बन गया है दुश्मन

पीपल बरगद काटते कुछ जन


प्रकृति की दर्द नहीं कोई सुनता

अपनी फायदे की हर कोई देखता

जंगल कट बन रहें हैं खेत

सावन ना बरसा धरा बनी रेत


अब पानी कौन बरसायेगा

बादल को कौन बुलायेगा

गंगा की पेट भरा है गाद

पानी गंगा की स्तर घटा है आज


मिट्टी बीमार पड़ तड़प रही

रासाईनिक खाद से बर्बाद हुई

मिट्टी बंजर बन रो रही धरती

उपजाऊ खेत भी दीखता है परती


पक्षी गण अब कम दीखते 

चहचहाट सुनने को कान तरसते

चील गिद्ध अब   लुप्त   हुए

पर्यावरण को शुद्ध कौन करे


क्यों बना पर्यावरण का दुश्मन अब तूँ

दुश्मनी का मजा इक दिन चखेगा तूँ

जब प्रकृति की भृकुटी चढ़ जायेगी

प्रलय की नजारा दिखलायेत्री


उस वक्त कोई ना तुम्हें बचायेगा

अपनी करनी की फल तूँ खायेगा

अब भी वक्त है सुधर   जाओ

युद्ध स्तर पर पेड़   लगाओ


आओ घर घर पेड़ लगायें

आम कटहल का मीठा फल खायें

पीपल बरगद की पेड़ लगाओं

धरती को पुनः हरा भरा बनाओ


उदय करता है सबसे अनुरोध

ऑगन में तुलसी का संयोग

हर घर जब भी आयेगा

प्राण वायु से पर्यावरण समृद्ध हो जायेगा।


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088