दो टूक: गाइए घर घर सोहर

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पुनः मुनादी हो रही,

देश हुआ खुशहाल।

सिसक रहा है रूपया,

लखकर अपना हाल।

कसाई विहँस रहा है।

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बढ़ा हुआ नाखून है,

काट रहा है केश।

हमसे औसत आय में,

आगे बंग्लादेश।

गाइए घर घर सोहर।

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सच के पथ पर अब यहाँ,

राही केवल चार।

दो के कर में देश है,

दो के कर व्यापार।

शेष के पास कटोरा।

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सात साल में बढ़ गया,

इतना हिन्दुस्तान।

दिया केन्या ने हमें,

बारह टन खाद्यान्न।

बोलिए जय विकास की।

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डीजल को मत पूछिए,

हार गया पेट्रोल।

रेस में दो के पार है,

अब सरसो का तेल।

हमारी कुशल कला से।

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हवा, दवा, सूई निरख,

भाग रहा है रोग।

साजिश करके मर रहे,

देश विरोधी लोग।

हमें बदनाम करन को।

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साथी अब मत कीजिए,

अच्छे दिन की बात।

इससे तो अच्छी रही,

बीती काली रात।

इमरजेंसी वाली भी।


- धीरु भाई ( धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव )