"अनुराग"

नहीं चाहत मुझे सुख की ,

नहीं धन कि पिपाशा है ।

रहूंगी संग संग तेरे ,

जहां अनुराग बनता है‌। 


               (1)


अनुराग पाकर तुम्हारा ,

धन्य हो जाऊंगी मैं  ।

बज उठेगी उर की वीणा, 

राग  हो जाऊंगी मैं।  


               (2)


 तेरे अनुराग की मुरली ,

धरके  अपने होठों पर।

बजाऊ प्रीत कि वो धुन,

 रिझाऊ अपना अंतर्मन । 


              (3)


 तेरे अनुराग का दीपक ,

जलाकर अपने अंतर में ।

दिखाऊ राह स्वर्णिम वो,

 करू लौकिक तिमिर घन को।


                  (4)


तुम्हारा साथ इक पल का,

मेरा सौभाग्य है प्रियतम ।

मिले अनुराग तेरा जो,

तो अर्पित कर दूं तन मन धन।


                  (5)

 मधुलिका राय "मल्लिका""

          गाजीपुर

       उत्तर प्रदेश