अब यह मन रिक्त पात्र है

अब यह मन रिक्त पात्र है,


साथ बात नहीं ढूंढता, 


नई दिवस है नई रात है, 


अब यह मन रिक्त पात्र है। 


चाह मन की इतनी केवल, 


इसमें मैं सार्थकता भर लूं,


भर लूं सूर्य का तेज नवल,


भर लू थोड़ा चांद धवल,


और थोड़ा सा नीलगगन, 


भर लू इसमें अथाह सागर की 


कुछ निर्मल प्रेम का जल,


भर लू इसमें धरा का धीरज, 


और कुछ पुण्यों का फल, 


रिक्तता में शाश्वत सत्य, 


भर जाएगा जिस भी पल,


पुरित होकर मगन पात्र यह,


छलकाएगा अमृत जल, 


फिर कितने रिक्त पात्रों में,


भर देगा जीवन निश्चल,


भर देगा जीवन निश्चल,

अब यह मन रिक्त पात्र है।


स्वरचित 

सर्वाधिकार v सुरक्षित

कवयित्री -अंजनी द्विवेदी (काव्या)

नवीन फल मंडी, अगस्त पार रोड 

जिला - देवरिया ,उत्तर प्रदेश