दूसरी लहर से चरमराती भारतीय अर्थव्यवस्था

आर्थिक मोर्चे पर कोरोना वायरस आग में घी का काम कर रहा है । कोरोना के कारण ऐसी तस्वीर बन रही है कि वैश्विक मंदी आना तय माना जा रहा है। दुनियाभर में तेजी के साथ फैल रहे घातक कोरोना वायरस ने वैश्विक अर्थव्यस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इसके चलते वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग और आपूर्ति दोनों पर असर पड़ा है। किसी भी देश के लिए अर्थव्यवस्था उसकी रीढ़ की हड्डी होती हैं और कोरोना काल में रीढ़ की हड्डी में मोच ही नहीं आ रही बल्कि टूटने के कगार पर भी आ गई हैं। ऐसे में भारत सरकार को गिरती अर्थव्यवस्था को रोकने के लिए एक मजबूत ब्रेक लगाने की जरूरत हैं जहां से हमारी अर्थव्यवस्था पीछे न जा के आगे की ओर बढ़ जाए। हाल ही में विश्वबैंक ने मंगलवार को भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2021 में 8.3 प्रतिशत और 2022 में 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया। विश्वबैंक ने यह भी कहा है कि कोविड-19 महामारी की अबतक की सबसे खतरनाक दूसरी लहर से आर्थिक सुधार को नुकसान पहुंचा है । बहुपक्षीय संस्थान ने ग्लोबल इकोनामिक प्रॉस्पेक्ट्स (वैश्विक आर्थिक संभावनाएं) शीर्षक रपट के नए संस्करण में कहा है कि भारत में 2020-21 की दूसरी छमाही में खासकर सेवा क्षेत्र में तीव्र तेजी की अपेक्षा की जा रही थी, लेकिन कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर ने इस पर बुरा प्रभाव डाला है। 

कोविड-19 की दूसरी लहर व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिये बेहद भयावह साबित हो रही है। भारत में प्रतिदिन कोविड-19 के नए मामले बड़ी संख्या में आ रहे थे । भारत की स्थिति पिछले साल की तुलना में अधिक खराब होती जा रही है एवं अभी भी भारत की एकमात्र उम्मीद यहाॅं टीके की अधिकाधिक उपलब्धता है।

फाइनेंशियल इयर 2020-21 में GDP ग्रोथ -7.3% रही है। 2019-20 में यह 4.2% थी। गिरावट के लिहाज से देखा जाए तो पिछले 40 साल में अर्थव्यवस्था का यह सबसे खराब दौर है। इससे पहले 1979-80 में ग्रोथ रेट -5.2% दर्ज की गई थी। इसकी वजह तब पड़ा सूखा था। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतें भी दोगुना बढ़ गई थीं। वित्त वर्ष 2020-21 में 4 तिमाहियों में पहली दो तिमाही में GDP में गिरावट रही, जबकि आखिरी दो तिमाही में इसमें बढ़त देखी गई।

2019- 20 में GDP की ग्रोथ रेट 4.2% थी। यह 11 साल में सबसे कम ग्रोथ रही थी। इससे पहले 2018-19 में यह 6.12%, 2017-18 में 7.04% और 2016-17 में यह 8.26% रही थी। इस गिरावट की अहम वजहें 2016, नवंबर में नोटबंदी और फिर 2017, जुलाई से GST लागू होना था।

एनआईबीआरआई के अनुसार सबसे अधिक वीक-ऑन-वीक डिक्लाइन: नोमुरा इंडिया बिजनेस रिजंप्शन इंडेक्स (एनआईबीआरआई), आर्थिक गतिविधि के सामान्यीकरण को साप्ताहिक रूप से जाँचता है। इसके अनुसार, फरवरी, 2021 में सूचकांक 99 अंक तक पहुॅंच गया, लेकिन अप्रैल में यह सूचकांक गिरकर 90.5 पर आ गया, जो वीक-ऑन-वीक में बड़ी गिरावट है। इस गिरावट का कारण मुख्य रूप से कोविड -19 की दूसरी लहर है।

 महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जो कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 30% से अधिक का योगदान करते हैं, वहाॅं COVID-19 मामलों में सबसे अधिक वृद्धि देखने को मिल रही है। यहाॅं तक ​​कि इन राज्यों में आंशिक लॉकडाउन एवं लॉकडाउन के कारण लगे प्रतिबंध भी आर्थिक गतिविधियों को प्रमुख रूप से प्रभावित करेंगे। साथ ही, यदि अनियंत्रित संक्रमणों के कारण लॉकडाउन को आगे बढ़ाया जाता है, तो नुकसान और भी अधिक व्यापक होगा।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में फरवरी, 2021 (अगस्त 2020 से) में 3.6% की दर से सबसे अधिक संकुचन देखी गई है। कोविड-19 मामलों की हालिया स्थिति ने आर्थिक मोर्चों पर चिंता बढ़ा दी है, विशेषकर अब जब दूसरी लहर के कारण आंशिक रूप से आर्थिक गतिविधियों पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना है। लॉकडाउन के कारण विनिर्माण क्षेत्र सीधे प्रभावित  हो रहा है और  यात्रा और पर्यटन जैसे संपर्क एवं सेवा क्षेत्रों पर कई गुना अधिक प्रभाव पड़ रहा हैं। क्योंकि इन क्षेत्रों का अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के साथ मजबूत अंतर्संबंध हैं।

आर्थिक रूप से बढ़ती श्रम लागतें, अमेरिका का चीन के साथ व्यापार युद्ध, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और 3डी प्रिंटिंग जैसे मुद्दे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर असर डालते रहे हैं। कोरोना वायरस के हमले के बाद कंपनियां अब मल्टीस्टेप, मल्टीकाउंट सप्लाई चेन को बहुत हद कर सिकोड़ लेंगी, जो आज दुनिया के औद्योगिक उत्पादन परिदृश्य पर हावी हैं। कोविड-19 ने अब इनमें से कई सप्लाई लिंक्स को तोड़ दिया है। कोरोना प्रभावित क्षेत्रों में फैक्ट्रियां बंद होने से दूसरे निर्माताओं, अस्पतालों, फार्मेसियों, सुपरमार्केटों और खुदरा स्टोरों में उत्पादों की कमी हो गई है। ई-कॉमर्स की दिग्गज अमेज़न के प्लेटफार्म से जुड़ी केवल 45% चीनी कंपनियां ही अभी सामानों की सप्लाई कर रही हैं। इसके कारण अमेजन ने इटली और फ्रांस में गैर जरूरी सामानों की आपूर्ति के आर्डर लेना रोक दिया।

नजर डालते हैं जीडीपी पर पड़ने वाले प्रभाव पर।GDP को घटाने या बढ़ाने के लिए चार इम्पॉर्टेंट इंजन होते हैं। पहला है, आप और हम। आप जितना खर्च करते हैं, वो हमारी इकोनॉमी में योगदान देता है। दूसरा है, प्राइवेट सेक्टर की बिजनेस ग्रोथ। ये GDP में 32% योगदान देती है। तीसरा है, सरकारी खर्च।इसका मतलब है गुड्स और सर्विसेस प्रोड्यूस करने में सरकार कितना खर्च कर रही है। इसका GDP में 11% योगदान है। और चौथा है, नोट डिमांड। इसके लिए भारत के कुल एक्सपोर्ट को कुल इम्पोर्ट से घटाया जाता है। क्योंकि भारत में एक्सपोर्ट के मुकाबले इम्पोर्ट ज्यादा है, इसलिए इसका इम्पैक्ट GPD पर निगेटिव ही पड़ता है।

अर्थव्यवस्था से उबरने के लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।  इसमें टीकाकरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका साबित होगी।  अर्थव्यवस्था को  बड़े व्यवधान से बचाने का एकमात्र प्रभावी तरीका टीकों की मांग और आपूर्ति दोनों में तेज़ी लाना है , वर्ना अर्थव्यवस्था के साथ साथ लोगों का भी कमर टूटना लाज़मी हैं। अब तक 23.6  करोड़ से अधिक टीके लगाए जा चुके हैं; लेकिन इसमें से देश की आबादी के केवल 14.2 % हिस्से को ही  कम-से-कम एक डोज प्राप्त हुई है, इसके विपरीत अमेरिका और यूके जैसे देश लगभग पूर्ण टीकाकरण के राह पर दिख रहे हैं। 

आने वाले कोविड-19 की तीसरी लहर को नियंत्रित करने में टीकाकरण की भूमिका प्रमुख साबित होगी। लेकिन टीकों की कमी से टीकाकरण की प्रगति धीमी हो सकती है। इसलिए  सरकार को टीकों की पहुॅंच बढ़ानी चाहिए तथा टीकाकरण के लिये पात्रता मानदंड को और अधिक विस्तारित करनी होगी। हालांकि सरकार ने राज्यों से टीकाकरण का अधिकार ले कर खुद करने का फैसला ली है जो कि टीकाकरण में मील का पत्थर साबित होने जा रहा हैं।

 बाजार में तरलता लाने के लिए टैक्स को कम करना होगा । जिससे कि बाजार में पैसा जाए और मांग बढ़े क्योंकि जब तक बाजार में मांग नहीं बढ़ेगी हमारी अर्थव्यवस्था रेंगती रहेगी। इसके आलावे जब तक केंद्र एवं राज्य दोनों पेट्रोप्रोडक्ट्स से अपने हिस्से का राजस्व कम नहीं करते एवं ईंधन पर लगने वाले कर को कम नहीं करते तब तक उपभोक्ताओं पर मूल्य दबाव कम नहीं होगा। पेट्रोल जहाँ अपनो मूल्यों में शतक लगा चुका हैं वहीं डीजल भी शतक के पास ही दिख रहा हैं। ऐसे में ट्रांसपोर्ट पर इसका असर दिखना लाजमी हैं।

नीति निर्माताओं की ओर से मांग और पूर्ति को सुधारने के लिये अधिक प्रयासों तथा  बेहतर नीतियों की आवश्यकता है किंतु इसे मुद्रास्फीति एवं समग्र आर्थिक स्थिरता को विचलित किये बिना किया जाना चाहिये।

इसके अलावा नीति निर्माताओं को यह नहीं भूलना चाहिये कि भारत पिछले साल की तुलना में वायरस से लड़ने के लिये बेहतर स्थिति में है। अतः केंद्र और राज्यों सरकारों का प्राथमिक उद्देश्य टीकाकरण अभियान को गति देना होना चाहिए। 

दूसरी लहर की एक और बड़ी समस्या कृषि को ले कर हैं। पहली लहर में तो गाँव तक कोरोना का पहुँच कम ही था ऐसे में कृषि का ग्रोथ काफी तेजी से हुआ था लेकिन इस बार कोरोना गांवों तक पहुँच कर कृषि पर भी नकारात्मक प्रभाव डाला हैं जिससे उबरने के लिए मशक्कत करनी होगी।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार तेजी से सुधार की भी संभावना जताई गई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2021 में 5.6 प्रतिशत वृद्धि की संभावना है।  अगर ऐसा होता तो है कि यह 80 साल में मंदी के बाद मजबूत वृद्धि होगी ।भारत की जीडीपी में 2021-22 (अप्रैल-मार्च) में 8.3 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद है। रिपोर्ट के अनुसार बुनियादी ढांचा, ग्रामीण विकास और स्वास्थ्य पर अधिक व्यय समेत नीतिगत समर्थन तथा सेवा एवं विनिर्माण में अपेक्षा से अधिक पुनरूद्धार से गतिविधियों में तेजी आएगी। 

कोरोना वायरस महामारी के कारण अगर आने वाले समय में पश्चिमी देशों के व्यवसायों और एशियाई और अफ्रीकी देशों के श्रम बल की श्रृंखला कमजोर पड़ती है तो लंबी अवधि में  संभवतः वैश्विक अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता घट जाएगी। इसके बदलने से वर्तमान अंतरराष्ट्रीय प्रणाली बड़े दबाव में आ जाएगी। जो साफ तौर पर पश्चिमी विकसित देशों के पक्ष में झुकी हुई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था का यह जोखिम विशेष रूप से विकासशील देशों, आर्थिक रूप से कमजोर श्रमिकों और गरीब लोगों के एक बड़े हिस्से के लिए बहुत अच्छा साबित हो सकता है। इससे उनके लिये नई संभावनाओं और अवसरों का मार्ग खुल सकता है।

          

-- नृपेन्द्र अभिषेक नृप

    छपरा , बिहार