मत बन समशेर ए हिंद के कलमसाज

मत बन समशेर ए हिंद के कलमसाज

सोचो सच्चाई दिखाते हुए तुम कलाम कर रहे हो भरोसा ए ईमान

जो स्वस्थ है उनका हौंसला क्यों पस्त कर रहे हो

जो गए उनका तो साथ हम क्या देंगे

उनकी अर्थियों को क्यों भुनवा रहे हो

सदा ही मर्यादा रही है जीवन मृत्यु के बीच

क्यों गिरा रहे हो ये दीवार जिंदा खबरों की शमशेर से

जो है  अभी जिंदा है मरीज 

उनको ये दिखाकर 

क्यों हालातो के भंवर में डाल रहे हो

क्या हिंद के कलमसाजो की

रूह से रेहम खत्म हो गया है

शर्म आती है उनको अपना कहने में

जो हालातो का फायदा उठा कर 

अपने झोले भरते है

ए अश्क तुम आंखो में ही रहना

क्योंकि औरो की आंखो के अश्क मर से गए है

स्वरचित

जयश्री बिरमी

अहमदाबाद