बचपन

कहां गया यह प्यारा बचपन

कहां खो गया आवारा बचपन

मस्ती का आलम मत पूछो

कुत्तों को गलबहियां डाले

रंग बिरंगी कपड़ों को करते थे

हम सब मिट्टी के हवाले

जैसे जैसे उमर बढ़ी

उन यादों की उम्र ढली

गूडे गुड़ियों का वह खेला

हंसते गाते रोते लड़ते

आपस में हम खुब झगड़ते

खान पीना सब कुछ त्यौहार

मम्मी-पापा सब करते थे प्यार

जब से लगा स्कूल का चक्र

बात बात पर पड़ती मार

घर में सब हमें सिखातें

मास्टर जी कक्षा में डराते

लड़की लड़के का क्या है चक्कर

तब हम सब नहीं कहां समझते

बचपन जाते जाते बोला

देख यार जवानी का रेला

रोज रोज होने लगा झमेला

कुछ बनने की चाहत में

मम्मी-पापा के हिदायत में

घर में आ गई लूगाई

होने लगी फिर हाथा पाई

पर जैसे ही बच्चा आया

उसमें अपना बचपन नज़र आया

कमल