टोरेट सिंड्रोम होता क्या है

अगर आपको लगातार हिचकी आती हैं या फिर हिचकी जैसा अनुभव होता है तो ये कोई साधारण बात नहीं है, ये एक तरह की बीमारी है,जोकि लाखों में से किसी एक को हो सकती है। हाल में रानी मुखर्जी की एक पिक्चर आई थी, हिचकी। इस पिक्चर में भी इस बीमारी का जिक्र हुआ है। पिक्चर में रानी मुखर्जी को ये बीमारी होती है। इसमें लगातार हिचिकयां आती रहती है। इस बीमारी को टोरेट सिंड्रोम कहा जाता है। इस बीमारी में नर्व सिस्टम में असर पड़ता है। इसमें व्यक्ति को अचानक हिचकियां आने लगती है और ये लगातार होता रहता है। कई बार थोड़ी देर के लिए और कई बार ज्यादा देर के लिए। आम हिचकी में एक या दो बार हिचकी आती है, लेकिन इस बीमारी में लगातार हिचकियां आती हैं और इस कंट्रोल करना मुश्किल होता है।

टोरेट सिंड्रोम होता क्या है

टोरेट एक तरह की दिमाग से जुड़ी बीमारी है, इसमें किसी भी बड़े या बच्चे को ये हिचकियां आने लगती है। ये बीमारी दो तरीके से हो सकती है या तो पर्यावरण के कारण या फिर जेनेटिक कारणों से। ज्यादातर मौकों पर ये बीमारी 18 साल की उम्र से पहले अटैक करती है। इस बीमारी के बारे में एक और बड़ी बात ये है कि ये ज्यादातर पुरुषों में पाई जाती है। जोकि ताउम्र चल सकती है, हालांकि हिचकी पिक्चर में ये बीमारी रानी मुखर्जी को होती है।

बीमारी के लक्ष्ण

टिक्स- 

इस बीमारी का सबसे बड़ा लक्षण हिचकी ही हैं। जोकि अचानक कभी भी आ सकती है और इसकी आवाज बहुत तेज भी हो सकती है। ऐसे में इस बीमारी के कारण समाज में काम करने वाले व्यक्ति को कई तरह की सामाजिक परेशानियों से दो चार होना पड़ सकता है।  

इस बीमारी को दो भागों में बांटा जा सकता है।

सिंपल टिक्स: 

इस तरह की टिक्स में थोड़े समय के लिए हिचकियां आती है। जिसमें आवाज भी कम होती है और सर, कंधों या गर्दन पर दबाव पड़ता है और इसमें अचानक मुवमेंट होने लगती है।  

कॉम्पलेक्स टिक्स:-

इस तरह की हिचकियों में लगातार हिचकियां आती रहती है और इसमें कई बार चेहरे के भाव भी बदल जाते हैं, जैसे की लकवे के दौरान होता है। साथ ही इसमें हिचकियों की आवाज भी काफी तेज होती है। कई बार इन हिचकियों से भारी तनाव भी हो जाता है और अक्सर रात में भी ये हिचकियां बहुत परेशानी पैदा कर सकती है। इससे बचने के लिए ध्यान एक बेहतर उपाय है।

इस बीमारी के क्या कारण है

अभी तक इस बीमारी के सही कारणों का पता नहीं लग पाया है। हालांकि ज्यादातर मामलों में ये जेनेटिक ही होती है। लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि अगर आपको ये बीमारी है तो आपके बच्चों को भी ये बीमारी होगी। एक शोध के मुताबिक सिर्फ  5-15 प्रतिशत मामलों में ही ये पाया गया है कि पेरेंट्स से ये बीमारी बच्चों गई हो।

क्या हिचकियों को दबाया जा सकता है

हिचकियों को दबाया तो नहीं जा सकता, लेकिन कई तरह की तरीकों से इस एनर्जी और प्रेशर को रिलीव किया जा सकता है। इससे हिचकियों को थोड़ा कम किया जा सकता है। हालांकि हिचकियों को कम करने के लिए इस तरह की संसेशन होती है जैसी कि छींक रोकने से होती है। हालांकि ये बात व्यक्ति से व्यक्ति पर निर्भर करती है कि कौन कैसे हिचकियों को कैसे दबा सकता है। कई बार इस तरह की हिचकियों को दबाने के लिए काफी परेशानी भी हो सकती है। हालांकि बच्चों को ये हिचकियां दबाने की कला नहीं आती क्योंकि इन पूरी प्रक्रिया में काफी परेशानी होती है।

बीमारी का पता कैसे चले 

डॉक्टर्स के मुताबिक अगर एक साल तक किसी व्यक्ति को लगातार हिचकियां आती रहे तो ये माना जा सकता है कि उसे ये बीमारी है। हालांकि किसी तरह के खून की जांच, किसी तरह की लेब्रोरटरी या फिर किसी अन्य जांच से ये पता नहीं लगाया जा सकता है। हालांकि एमआरआई, क्प्यूटर टेपोग्राफी आदि से रेयर केसेज में इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है।  

बीमारी का इलाज कैसे हो

दुर्भाग्यवश अभी तक हिचकियों की बीमारी का पूरा इलाज नहीं खोजा जा सका है। न ही इस बीमारी के लक्ष्णों को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है। हालांकि इस बीमारी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयों का साइड इफैक्ट काफी पड़ता है। कई बार साइड इफैक्ट को कम करने के लिए दवाइयों का डोज कम करना एक बेहतर उपाय हो सकता है। इसके इलाज की दवाइयों के साइड इफैक्ट में कई बार वजन बढऩा, आलस आना प्रमुख है।

इलाज में परेशनियां  

इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति के लिए स्वस्थ्य और बेहतर जीवन जीने में कोई परेशानी नहीं है। लेकिन कई बार इस व्यक्ति के लगातार हिचकियां लेने से सामाजिक तौर पर परेशानियां झेलनी पड़ सकती है। जैसा कि फिल्म हिचकी में दिखाया गया है।

कैसे ठीक हो सकती है बीमारी

जिस बच्चे या बड़े को ये बीमारी है, उसके साथ किसी तरह की एक्टिविटी में लगना चाहिए, जोकि उन्हें पसंद हो, चाहे वो स्पोर्टस हो या फिर संगीत हो, इस तरह की हॉबी हिचकियों में कमी लाने में सहायक होगी। पेरेंटस को चाहिए कि जिस व्यक्ति को ये बीमारी है, उसमें सेल्फ  कॉफिडेंस को बढ़ाना बहुत जरूरी है। ताकि वो सामाजिक तौर पर अपने को मजबूती से पेश कर सके।

डॉ. सुमित सिंह

डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी

अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ  न्यूरोसाइंसेस आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम

9953807842