उस ओर

शांत वहती नदी के,

    किनारे वैठा हो मेरा अस्तित्व

        प्रत्यक्षारत संध्या की ।


कुछ हो हल्का अन्धेरा

    दिशा हो तरुणाई

        कुछ और हो गहरा आकाश

            तव वैठूं नाव में...।


चल दूँ कहीं,विना दिशा के

    तब चमके क्षितिज में शशि ...।


मैं अपने अस्तित्व को उसी

    मन्द्र शीतल आलोकित सलिला में

        लिऐ चलूं...।


कहीं दूर विना दिशा के

    बस खो जाऊं कहीं उन्ही,

        शांत वहती हुई सरिता में

            सदा-सदा के लिये ...।


चमकता रहे चन्द्रमा

    हमेशा-हमेशा के लिये

        मेरे जीवन के अस्तित्व में...।


यू.एस.बरी,✍

मैंहन्दी वाला सयैद, लश्कर,ग्वालियर म.प्र.

Udaykushwah037@gmail.com