हिम्मत-ए-मर्दा मदद-ए-खुदा"

बुलंदियों को छूना आसान नहीं सही में ज़िंदगी का सफ़र उन्हीं का शुरू होता है जो कदम उठाने की हिम्मत रखता है। 

संभावनाओं के आसमान पर हौसलों की उड़ान जो भरता है उसीका सितारा आफ़ताब की रोशनी में भी झिलमिलाता नज़र आता है।

वक्त की धुंध में खोने वाले की दिल की ज़मीं पर अरमानों के फूल नहीं खिलते, संघर्ष की धूप में जो तपता है अमलतास खुशीयों के उसी आँगन में खिलता है।

रात के भी मौसम आते है ज़िंदगी में, जूझते तमस की तिलमिलाहट से जो साहस का रंग भरता है उसीको नवभोर का दर्शन होता है।

कालखंड के भीतर क्या छुपा है नहीं जानता कोई, कुरेदकर ज़िंदगी की ज़मीं जो कुंदन निकालता है उसीकी लकीरों में  सुकून के मोती झगमगाते है।

नसीब के भरोसे आलस्य की क्षितिज पर बैठे सफ़लता का इंतज़ार करके जो बैठे रहे, उसके जीवन के दरवाज़े कहाँ खुल पाते है, हिम्मत-ए- मर्दा मदद-ए-खुदा बोलने वालों के ही सितारे बुलंद होते है।

(भावना ठाकर बेंगलोर)#भावु